अल नीनो का बढ़ता प्रकोप और उसका वैश्विक प्रभाव

The intensifying impact of El Niño and its global consequences

महेन्द्र तिवारी

प्रकृति के चक्र में महासागरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वे न केवल पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करते हैं बल्कि वैश्विक मौसम प्रणालियों को भी संचालित करते हैं। हाल के वर्षों में प्रशांत महासागर के गर्भ में हो रहे एक बड़े बदलाव ने दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं की चिंताओं को गहरा कर दिया है। इस बदलाव को विज्ञान की भाषा में अल नीनो कहा जाता है। अल नीनो कोई सामान्य मौसमी घटना नहीं है बल्कि यह एक अत्यंत जटिल महासागरीय और वायुमंडलीय प्रक्रिया है जो हर कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर तबाही का कारण बनती है। वर्तमान समय में चिंता की बात यह है कि वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि के कारण अल नीनो के इस बार के सारे पुराने रिकॉर्ड टूटने की आशंका जताई जा रही है। इसका सीधा अर्थ यह है कि आने वाले समय में दुनिया को पहले से कहीं अधिक चरम मौसम, विनाशकारी बाढ़, भीषण सूखे और अप्रत्याशित दावानल का सामना करना पड़ सकता है।

इस पूरी प्रक्रिया को तकनीकी रूप से समझने के लिए हमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सामान्य स्थिति और वायुमंडलीय चक्र को समझना होगा। सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर में पूर्व से पश्चिम की ओर यानी दक्षिण अमेरिका से इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ मजबूत व्यापारिक हवाएं चलती हैं। ये हवाएं समुद्र की सतह के गर्म पानी को अपने साथ बहाकर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र की ओर ले जाती हैं। इस वजह से इंडोनेशिया और उसके आसपास के समुद्री क्षेत्रों में भारी मात्रा में गर्म पानी इकट्ठा हो जाता है। गर्म पानी के इस जमाव के कारण वहाँ की हवा गर्म होकर ऊपर उठती है और एक मजबूत निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनाती है। हवा के ऊपर उठने से घने बादलों का निर्माण होता है जिससे इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण एशिया के देशों में अच्छी वर्षा होती है। यही निम्न वायुदाब क्षेत्र आगे चलकर हिंद महासागर से नमी युक्त मानसूनी हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप की ओर आकर्षित करता है जिससे भारत में एक समृद्ध मानसून का आगमन होता है। इसके विपरीत, दक्षिण अमेरिका के पेरू और इक्वाडोर जैसे देशों के तटों पर समुद्र की गहराई से ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर आता है जो वहाँ के मत्स्य उद्योग और सामान्य जलवायु को संतुलित रखता है। इस पूरे वायुमंडलीय चक्र को मौसम विज्ञान में वॉकर सर्कुलेशन या वॉकर चक्र कहा जाता है।

परंतु अल नीनो के आगमन के साथ ही यह पूरा स्थापित चक्र पूरी तरह से उलट जाता है। अल नीनो की शुरुआत तब होती है जब प्रशांत महासागर में बहने वाली ये व्यापारिक हवाएं अप्रत्याशित रूप से कमजोर पड़ जाती हैं। हवाओं के कमजोर होने से वह शक्ति समाप्त हो जाती है जो गर्म पानी को पश्चिमी हिस्से में रोके रखती थी। परिणामस्वरूप, पश्चिमी प्रशांत महासागर में संचित विशाल गर्म जलराशि वापस पूर्व की ओर यानी दक्षिण अमेरिका के तटों की तरफ खिसकने लगती है। इसके कारण मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कई डिग्री सेल्सियस अधिक बढ़ जाता है। समुद्र के गर्म होने का यह क्षेत्र इतना विशाल होता है कि यह पूरे वैश्विक वायुमंडल को प्रभावित करने लगता है। जैसे ही गर्म पानी का यह क्षेत्र पूर्व की ओर खिसकता है, वैसे ही बादलों को बनाने वाला और हवा को ऊपर उठाने वाला निम्न वायुदाब का केंद्र भी इंडोनेशिया से हटकर हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर के मध्य में चला जाता है।

इस दबाव प्रणाली के बदलने का सबसे बड़ा आघात भारत और उसके पड़ोसी देशों के मानसून पर पड़ता है। जब निम्न वायुदाब का क्षेत्र प्रशांत महासागर के बीच में चला जाता है, तो हिंद महासागर और इंडोनेशिया के ऊपर एक विशाल उच्च वायुदाब का क्षेत्र निर्मित हो जाता है। मौसम विज्ञान के नियमों के अनुसार उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों में हवाएं ऊपर उठकर बादल बनाने के बजाय भारी होकर नीचे की ओर बैठने लगती हैं। जब हवा नीचे बैठती है तो वह बादलों के बनने की प्रक्रिया को पूरी तरह से दबा देती है। इस वायुमंडलीय व्यवधान के कारण जो मानसूनी हवाएं हिंद महासागर से भारी नमी लेकर भारत की ओर बढ़ने वाली होती हैं, वे अपनी दिशा और ऊर्जा दोनों खो देती हैं। भारतीय उपमहाद्वीप की ओर आने वाला हवाओं का यह प्रवाह कमजोर पड़ जाता है जिसके कारण मानसूनी बारिश में भारी गिरावट आती है। इतिहास गवाह है कि जब भी प्रशांत महासागर में एक शक्तिशाली अल नीनो सक्रिय हुआ है, तब भारत को गंभीर सूखे और मानसूनी अनिश्चितता का सामना करना पड़ा है।

अल नीनो का यह प्रभाव केवल दक्षिण एशिया तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि इसका वैश्विक दायरा बेहद विनाशकारी होता है। एक तरफ जहां ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, भारत और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में बारिश न होने से नदियां और जलाशय सूख जाते हैं, कृषि ठप हो जाती है और जंगलों में भीषण आग लग जाती है, वहीं दूसरी तरफ दक्षिण अमेरिका के देशों जैसे पेरू, इक्वाडोर और ब्राजील में रिकॉर्ड तोड़ मूसलाधार बारिश होती है। इन क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा के कारण अचानक भयानक बाढ़ और भूस्खलन आते हैं जिससे जान-माल का भारी नुकसान होता है। इसके अलावा समुद्र का तापमान बढ़ने से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर भी गहरा संकट मंडराने लगता है। पेरू के तट पर ठंडे पानी का ऊपर आना बंद हो जाता है जिससे मछलियों का भोजन समाप्त हो जाता है और बड़े पैमाने पर समुद्री जीवों की मृत्यु होती है। साथ ही दुनिया भर की मूंगा चट्टानें यानी कोरल रीफ समुद्र की इस अत्यधिक गर्मी को सहन नहीं कर पातीं और उनका बड़े पैमाने पर क्षरण होने लगता है जिसे कोरल ब्लीचिंग कहा जाता है। मूंगा चट्टानों का नष्ट होना पूरे समुद्री जीवन की खाद्य श्रृंखला को संकट में डाल देता है।

आज के दौर में अल नीनो का यह खतरा इसलिए और भी अधिक भयानक हो गया है क्योंकि इसे मानव जनित जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग से अतिरिक्त ऊर्जा मिल रही है। औद्योगिक गतिविधियों के कारण हमारी धरती और महासागर पहले से ही इतिहास के सबसे गर्म दौर से गुजर रहे हैं। जब ग्लोबल वॉर्मिंग से पहले से ही गर्म हो चुके समुद्र में अल नीनो का प्रभाव जुड़ता है, तो मौसमी चरम सीमाएं अप्रत्याशित रूप से उग्र हो जाती हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक अब सुपर अल नीनो जैसी शब्दावली का उपयोग कर रहे हैं। इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर तैयारी और दीर्घकालिक नीतियों की आवश्यकता है। कृषि के तरीकों में बदलाव, सूखे से निपटने वाले बीजों का विकास, जल संरक्षण प्रणालियों का सुदृढ़ीकरण और चरम मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने वाली तकनीकों में निवेश करना अब किसी भी देश के लिए वैकल्पिक नहीं बल्कि अनिवार्य हो गया है। पृथ्वी के इस बदलते मिजाज और महासागरों की इस चेतावनी को समझकर ही मानवता अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकती है।