सत्य भूषण शर्मा
भारतीय संस्कृति की आत्मा उसकी लोक परंपराओं में बसती है। लोकगीत, लोकनृत्य और लोककथाएँ केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता, इतिहास और जीवन मूल्यों की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। ऐसी ही एक महान लोक परंपरा पंडवानी को विश्व मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने वाली महान लोकगायिका तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी अद्भुत स्वर-साधना, अभिनय क्षमता और लोककला के प्रति समर्पण सदैव अमर रहेगा।
तीजन बाई का निधन भारतीय लोककला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय तक लोकसंस्कृति की सेवा की और अपनी कला के माध्यम से छत्तीसगढ़ की धरती की सुगंध को पूरी दुनिया तक पहुँचाया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची प्रतिभा परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती, बल्कि संघर्षों को पार करते हुए इतिहास रचती है।
साधारण परिवार से विश्व मंच तक की यात्रा
तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को तत्कालीन मध्य प्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। उनका संबंध पारधी समुदाय से था। बचपन से ही उन्हें लोककथाओं, गीतों और धार्मिक आख्यानों में गहरी रुचि थी। उनके नाना ब्रजलाल पारधी से उन्हें महाभारत की कथाओं और पंडवानी गायन की प्रारंभिक प्रेरणा मिली।
ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी तीजन बाई ने बहुत कम उम्र में ही अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय देना शुरू कर दिया था। उस समय समाज में महिलाओं के लिए मंच पर आकर लोकगायन करना सहज नहीं था। विशेषकर पंडवानी की कापालिक शैली, जिसमें गायन के साथ अभिनय और भाव-प्रदर्शन की प्रधानता होती है, पुरुष कलाकारों का क्षेत्र मानी जाती थी। लेकिन तीजन बाई ने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी और अपनी प्रतिभा के बल पर एक नई पहचान बनाई।
पंडवानी को मिली नई ऊंचाई
पंडवानी छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोकगायन शैली है, जिसमें महाभारत की कथाओं को संगीत, संवाद, अभिनय और भाव-भंगिमाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। इसमें कलाकार केवल कथावाचक नहीं होता, बल्कि विभिन्न पात्रों को अपने अभिनय से जीवंत कर देता है।
तीजन बाई की सबसे बड़ी विशेषता उनकी प्रभावशाली आवाज, मंचीय ऊर्जा और कथा कहने की अद्भुत शैली थी। वे जब हाथ में तंबूरा लेकर मंच पर उतरती थीं तो ऐसा लगता था मानो महाभारत के पात्र स्वयं जीवंत हो उठे हों। उनके स्वर में वीर रस की गर्जना, करुणा की संवेदना और जीवन दर्शन की गहराई दिखाई देती थी।
उन्होंने भीम के पराक्रम, अर्जुन की वीरता, द्रौपदी की पीड़ा और कृष्ण की नीति को अपनी कला के माध्यम से इस प्रकार प्रस्तुत किया कि दर्शक कथा से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते थे। उनकी प्रस्तुतियाँ केवल लोक मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों का सजीव पाठ होती थीं।
संघर्षों से निर्मित हुआ इतिहास
तीजन बाई का जीवन संघर्ष और साधना की प्रेरक कहानी है। आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक विरोध के बावजूद उन्होंने अपनी कला का मार्ग नहीं छोड़ा। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि यदि व्यक्ति के भीतर प्रतिभा, आत्मविश्वास और निरंतर अभ्यास हो तो कोई भी बाधा सफलता के मार्ग को रोक नहीं सकती।
उन्होंने उस समय महिलाओं के लिए कठिन माने जाने वाले क्षेत्र में प्रवेश किया और अपनी मेहनत से पंडवानी को नई प्रतिष्ठा प्रदान की। उनकी सफलता ने देश की अनेक ग्रामीण महिलाओं और युवा कलाकारों को अपनी कला और प्रतिभा पर विश्वास करने की प्रेरणा दी।
विश्व मंच पर भारतीय लोककला की पहचान
तीजन बाई ने अपनी कला के माध्यम से केवल छत्तीसगढ़ की पंडवानी को ही लोकप्रिय नहीं बनाया, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों के अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर उन्होंने अपनी प्रस्तुतियाँ दीं। उनकी कला भाषा और भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर सीधे मानव संवेदनाओं से जुड़ती थी।
उनकी प्रस्तुति में भारतीय महाकाव्य की गहराई, लोकभाषा की मिठास और अभिनय की जीवंतता का अद्भुत संगम दिखाई देता था। विदेशी दर्शक भी उनकी ऊर्जा, भावाभिव्यक्ति और कथावाचन शैली से प्रभावित हुए। उन्होंने यह साबित किया कि लोककला किसी एक क्षेत्र या समुदाय की संपत्ति नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की साझा धरोहर होती है।
सम्मानों से अलंकृत हुआ अद्वितीय योगदान
तीजन बाई की कला-साधना को देश ने अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया। उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए।
ये सम्मान केवल एक कलाकार की व्यक्तिगत उपलब्धियाँ नहीं थे, बल्कि भारतीय लोक परंपराओं और ग्रामीण कला प्रतिभाओं के सम्मान का प्रतीक थे। तीजन बाई ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि लोककलाकार भी विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं और देश की सांस्कृतिक गरिमा को बढ़ा सकते हैं।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
आज जब आधुनिक तकनीक और बदलते मनोरंजन माध्यमों के कारण अनेक लोककलाएँ धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही हैं, तब तीजन बाई का जीवन हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। उन्होंने दिखाया कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाकर लोककलाओं को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया जा सकता है।
उनका मानना था कि लोककला केवल मंच पर प्रस्तुति देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की स्मृतियों, भावनाओं और जीवन मूल्यों को संजोने का कार्य करती है। उनके प्रयासों से पंडवानी केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रही, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त करने में सफल हुई।
लोककला के इतिहास में अमर रहेगा नाम
तीजन बाई का जीवन संघर्ष, साधना और सफलता की प्रेरक गाथा है। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में जन्मी प्रतिभा को अपनी मेहनत और लगन से विश्व प्रसिद्ध बनाया। वे उन कलाकारों में शामिल हैं जिन्होंने अपनी कला को केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति की सेवा का माध्यम माना।
उनके निधन के बाद भी उनकी आवाज, उनकी शैली और उनकी कला आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। पंडवानी के मंच पर जब भी महाभारत की कथाएँ गूंजेंगी, तब तीजन बाई की स्मृति स्वाभाविक रूप से जीवंत हो उठेगी।
भारत की सांस्कृतिक यात्रा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो समय की सीमाओं से परे जाकर अमर हो जाते हैं। तीजन बाई भी ऐसी ही महान विभूति थीं। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि मिट्टी से जुड़ी कला भी विश्व के मंच पर सम्मान और गौरव प्राप्त कर सकती है।
उनकी स्वर-साधना भारतीय लोकसंस्कृति की अमूल्य धरोहर है। आने वाली पीढ़ियाँ उनके जीवन से प्रेरणा लेकर लोककलाओं के संरक्षण और संवर्धन का संकल्प लेंगी, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।





