महेन्द्र तिवारी
भारतीय वायुसेना को लेकर हाल ही में सामने आई विश्व स्तर की रैंकिंग ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता, संचालन क्षमता, प्रशिक्षण, तकनीकी दक्षता और रणनीतिक तैयारी से जीते जाते हैं। वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ मॉडर्न मिलिट्री एयरक्राफ्ट यानी WDMMA द्वारा जारी नवीनतम ग्लोबल एयर पावर रैंकिंग में भारत को चीन से ऊपर स्थान दिया गया है। यह उपलब्धि केवल एक रैंकिंग भर नहीं है, बल्कि पिछले कई वर्षों से भारतीय वायुसेना द्वारा किए जा रहे आधुनिकीकरण, बेहतर प्रशिक्षण, तकनीकी उन्नयन और परिचालन क्षमता में निरंतर सुधार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली मान्यता भी है। WDMMA ने 103 देशों की 129 सैन्य वायु इकाइयों तथा लगभग 48,082 सैन्य विमानों का अध्ययन करके यह मूल्यांकन तैयार किया है। इसमें केवल विमानों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक युद्ध क्षमता, रखरखाव, उपलब्धता, तकनीकी स्तर, प्रशिक्षण, हथियार प्रणाली, लॉजिस्टिक सहायता और भविष्य की क्षमता जैसे अनेक पहलुओं को शामिल किया गया है।
रैंकिंग में अमेरिका की वायुसेना पहले स्थान पर है और उसके बाद अमेरिकी नौसेना तथा रूस की वायुसेना का स्थान आता है। इसके बाद अमेरिकी सेना और मरीन कॉर्प्स की विमानन शाखाएं हैं। भारतीय वायुसेना छठे स्थान पर है जबकि चीन की वायुसेना सातवें स्थान पर है। पहली नजर में यह परिणाम कई लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है क्योंकि चीन के पास भारत की तुलना में कहीं अधिक संख्या में सैन्य विमान हैं। फिर भी भारत को आगे रखा गया है। इसका कारण यह है कि आधुनिक सैन्य मूल्यांकन में केवल संख्या निर्णायक नहीं होती। किसी भी वायुसेना की वास्तविक ताकत इस बात से तय होती है कि वह अपने विमानों का कितनी प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकती है, उसके पायलट कितने प्रशिक्षित हैं, उसकी युद्धक रणनीति कितनी मजबूत है और वह किसी भी संकट की स्थिति में कितनी तेजी से प्रतिक्रिया देने में सक्षम है।
भारतीय वायुसेना की सबसे बड़ी विशेषता उसका व्यापक परिचालन अनुभव है। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने अनेक युद्धों, सीमित सैन्य अभियानों, आतंकवाद विरोधी अभियानों तथा मानवीय राहत कार्यों में अपनी वायु शक्ति का सफल उपयोग किया है। चाहे 1971 का युद्ध हो, कारगिल संघर्ष हो या हाल के वर्षों में सीमा पर उत्पन्न तनावपूर्ण परिस्थितियां, भारतीय वायुसेना ने समय पर, सटीक और प्रभावी कार्रवाई करके अपनी क्षमता का परिचय दिया है। इस लंबे अनुभव ने उसे केवल तकनीकी रूप से ही नहीं बल्कि रणनीतिक रूप से भी अधिक परिपक्व बनाया है।
भारत ने पिछले एक दशक में वायुसेना के आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया है। आधुनिक लड़ाकू विमान, लंबी दूरी की मिसाइलें, उन्नत रडार, नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली, स्वदेशी तकनीकों का बढ़ता उपयोग और निगरानी क्षमता में उल्लेखनीय सुधार ने भारतीय वायुसेना को नई शक्ति प्रदान की है। फ्रांस से प्राप्त राफेल लड़ाकू विमानों ने भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि की है। इनके साथ आधुनिक मिसाइल प्रणालियां और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली भी जुड़ी हुई हैं, जिससे किसी भी संभावित संघर्ष में भारत की प्रतिक्रिया क्षमता पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हुई है। साथ ही तेजस जैसे स्वदेशी लड़ाकू विमान भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
भारत की भौगोलिक स्थिति भी उसकी वायु रणनीति को विशेष महत्व देती है। एक ओर पाकिस्तान की सीमा है तो दूसरी ओर चीन जैसी बड़ी सैन्य शक्ति। उत्तर में ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र, पश्चिम में रेगिस्तान, पूर्वोत्तर के कठिन पर्वतीय इलाके और दक्षिण में विशाल समुद्री क्षेत्र भारतीय वायुसेना के सामने विविध प्रकार की चुनौतियां प्रस्तुत करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में किसी भी वायुसेना को बहुआयामी क्षमता विकसित करनी पड़ती है। भारतीय वायुसेना ने इन सभी परिस्थितियों के अनुरूप प्रशिक्षण और संसाधनों का विकास किया है। यही कारण है कि उसकी परिचालन क्षमता को विश्व स्तर पर सराहा जा रहा है।
चीन के पास विमानों की संख्या अधिक होने के बावजूद भारत का आगे आना यह भी दर्शाता है कि आधुनिक युद्ध में गुणवत्ता का महत्व लगातार बढ़ रहा है। किसी देश के पास हजारों विमान होने से वह स्वतः सबसे शक्तिशाली नहीं बन जाता। यदि उन विमानों का रखरखाव, प्रशिक्षण, तकनीकी उन्नयन और युद्ध के समय उनका समन्वित उपयोग प्रभावी नहीं है तो संख्या का लाभ सीमित हो जाता है। WDMMA का मूल्यांकन इसी व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित है। इसी कारण भारतीय वायुसेना को उसके वास्तविक परिचालन प्रदर्शन और समग्र युद्ध क्षमता के आधार पर बेहतर स्थान मिला है।
हालांकि यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत के सामने कई चुनौतियां भी मौजूद हैं। भारतीय वायुसेना लंबे समय से अपने स्वीकृत लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या से कम स्क्वाड्रनों के साथ कार्य कर रही है। पुराने लड़ाकू विमानों को चरणबद्ध तरीके से सेवा से हटाया जा रहा है और उनकी जगह नए विमानों की आवश्यकता लगातार बनी हुई है। आने वाले वर्षों में तेजस के नए संस्करण, उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान कार्यक्रम और पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी लड़ाकू विमान परियोजना जैसे कार्यक्रमों की सफलता भारत की वायु शक्ति को और अधिक मजबूत बनाएगी।
भविष्य के युद्धों का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। अब केवल लड़ाकू विमान ही निर्णायक नहीं होंगे बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मानव रहित विमान, स्वार्म ड्रोन, साइबर युद्ध, अंतरिक्ष आधारित निगरानी, नेटवर्क आधारित कमान प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसी तकनीकें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। भारत इन क्षेत्रों में भी तेजी से निवेश कर रहा है। रक्षा अनुसंधान संस्थानों और निजी उद्योगों की भागीदारी बढ़ने से देश की रक्षा उत्पादन क्षमता में सुधार हो रहा है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत रक्षा उपकरणों का स्वदेशी निर्माण भविष्य में भारत की सामरिक स्वतंत्रता को और मजबूत करेगा।
भारतीय वायुसेना केवल युद्ध लड़ने वाली संस्था नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं, बाढ़, भूकंप, महामारी और अन्य संकटों के समय भी उसने हजारों लोगों की जान बचाई है। राहत सामग्री पहुंचाना, दूरदराज के क्षेत्रों से नागरिकों को निकालना, विदेशों से भारतीयों की सुरक्षित वापसी और मानवीय सहायता पहुंचाना उसके नियमित कार्यों का हिस्सा बन चुका है। इस कारण भारतीय वायुसेना की छवि केवल एक सैन्य शक्ति की नहीं बल्कि राष्ट्रीय सेवा के विश्वसनीय संगठन की भी है।
आज दुनिया में सैन्य शक्ति का अर्थ केवल आक्रमण की क्षमता नहीं बल्कि प्रभावी प्रतिरोध की क्षमता भी है। मजबूत वायुसेना किसी भी देश के लिए सुरक्षा कवच का कार्य करती है। यदि किसी देश की वायु शक्ति सक्षम होती है तो संभावित विरोधी भी आक्रामक कदम उठाने से पहले कई बार सोचने को विवश होता है। भारत की बढ़ती वायु शक्ति इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्रीय स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों को मजबूत करती है।
भारत की उपलब्धि का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इससे देश के रक्षा उद्योग और वैज्ञानिक समुदाय का मनोबल बढ़ेगा। स्वदेशी तकनीकों के विकास, अनुसंधान और नवाचार को नई गति मिलेगी। इससे रोजगार, औद्योगिक विकास और तकनीकी आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिलेगा। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल सैन्य आवश्यकता नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी भी वैश्विक रैंकिंग को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। विभिन्न संस्थाएं अलग-अलग मानकों के आधार पर मूल्यांकन करती हैं और उनके निष्कर्ष भी अलग हो सकते हैं। फिर भी यदि किसी प्रतिष्ठित संस्था द्वारा भारत की वायु शक्ति को चीन से बेहतर आंका गया है तो यह भारतीय वायुसेना की पेशेवर क्षमता, अनुशासन, प्रशिक्षण और तकनीकी दक्षता का महत्वपूर्ण संकेत अवश्य है। यह उपलब्धि संतोष का विषय है, लेकिन इसे अंतिम लक्ष्य मानने के बजाय आगे की तैयारी का आधार बनाया जाना चाहिए।
आने वाले वर्षों में भारत को अपने लड़ाकू विमान बेड़े का विस्तार, आधुनिक मिसाइल प्रणालियों का समावेश, स्वदेशी विमान निर्माण, ड्रोन तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्ध प्रणाली और अंतरिक्ष आधारित सैन्य क्षमताओं पर निरंतर निवेश करना होगा। यदि यह गति बनी रहती है तो भारतीय वायुसेना न केवल एशिया बल्कि विश्व की सबसे प्रभावशाली वायु सेनाओं में और मजबूत स्थान प्राप्त कर सकती है। वर्तमान रैंकिंग यह संदेश देती है कि आधुनिक युद्ध की दुनिया में केवल संसाधनों का आकार नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता, तैयारी, रणनीतिक सोच और निरंतर नवाचार ही किसी राष्ट्र को वास्तविक शक्ति प्रदान करते हैं। भारत ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाए हैं और यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।





