राजस्थान विधानसभा की 75 वर्षों की यात्रा संसदीय इतिहास में बनी मील का पत्थर

The 75-year journey of the Rajasthan Legislative Assembly marks a milestone in parliamentary history

वासुदेव देवनानी

राजस्थान की सर्वोच्च विधायी संस्था राजस्थान विधानसभा ने पिछले 75 वर्षों में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को मजबूत बनाने, जनहितकारी कानूनों का निर्माण करने तथा सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 1952 में प्रथम निर्वाचित विधानसभा के गठन के साथ प्रारंभ हुई सात दशकों से अधिक अवधि की इसकी यात्रा आज भारतीय लोकतंत्र की संसदीय इतिहास में मील का पत्थर बन कर उभरी है ।

संसदीय यात्रा के सारथी एक साथ दिखेंगे

यह केवल कानून बनाने वाला सदन नहीं, बल्कि राज्य की जनता की आकांक्षाओं, समस्याओं और अपेक्षाओं को शासन तक पहुँचाने का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। देश भर में राजस्थान विधानसभा का अपनी स्वस्थ और समृद्ध लोकतांत्रिक परंपराओं एवं आदर्श विरासत के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थान है। राजस्थान विधानसभा की 75 वर्षों की ऐतिहासिक और गौरवमयी यात्रा की सुन्दर तस्वीर पन्द्रह जुलाई से प्रारम्भ हो रहें विधानसभा के अमृत जयन्ती महोत्सव में देखने मिलेगी जिसमें राजस्थान की सात दशकों की संसदीय यात्रा के सारथी एक साथ दिखाई देंगे ।

राजस्थान निर्माण और विधानसभा का गठन

भारत की स्वतंत्रता के बाद राजस्थान का निर्माण छोटी बड़ी रियासतों के क्रमिक एकीकरण से हुआ और 30 मार्च 1949 को वृहद राजस्थान की स्थापना हुई तथा 26 जनवरी 1949 को भारतीय संविधान के लागू होने के बाद वर्ष 1952 में प्रथम आम चुनाव संपन्न हुए और राजस्थान विधानसभा का पहला निर्वाचित सदन भी अस्तित्व में आया। राजस्थान विधानसभा का गठन 23 फरवरी 1952 को हुआ और 29 मार्च 1952 को इसकी पहली बैठक हुई । राजस्थान विधानसभा में प्रारम्भ में 160 विधायक थे जो कालांतर में नवंबर 1956 में अजमेर विधानसभा के राजस्थान में सम्मिलित होने के बाद 190 हो गए। तदुपरांत यह संख्या 176 तथा राज्य पुनर्गठन आयोग की अनुशंसा पर 1967 में विधानसभा के सदस्यों की संख्या 184 हो गई और वर्ष 1977 से अब तक यानी वर्तमान में विधानसभा में निर्वाचित सदस्यों की संख्या 200 हैं, जिनमें अनुसूचित जाति के 34 विधायक और अनुसूचित जनजाति के 25 विधायक एवं 21 महिला विधायक शामिल है जोकि राज्य के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारतीय संविधान के अनुसार विधानसभा का कार्यकाल सामान्यतः पाँच वर्ष का होता है। सदन का संचालन अध्यक्ष द्वारा किया जाता है, जबकि राज्यपाल विधानसभा का अभिन्न अंग होते हैं। विधानसभा का प्रमुख दायित्व कानून बनाना, राज्य का बजट पारित करना, सरकार को उत्तरदायी बनाए रखना तथा जनहित से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श करना है।

पुराने से नए विधानसभा का सफ़र

राजस्थान विधानसभा 50 वर्षों तक जयपुर के सवाई मानसिंह टाउन हॉल में चली और कालांतर में नया विधानसभा भवन बनने के बाद पिछले 25 वर्षों से यह वर्तमान भवन में संचालित हो रही है। राजस्थान विधानसभा का वर्तमान भवन जयपुर के ज्योति नगर (लालकोठी) में स्थित है। इस भवन में राजस्थान विधानसभा का पहला सत्र मार्च 2001 में प्रारम्भ हुआ और उस वर्ष का पहला बजट भी प्रस्तुत हुआ । इससे पहले राजस्थान विधानसभा के गठन (1952) से लेकर वर्ष 2000 तक विधानसभा की कार्यवाही जयपुर की बड़ी चौपड़ के निकट जलेब चौक स्थित सवाई मानसिंह टाउन हॉल से संचालित हुई । 6 नवंबर 2000 को ग्यारहवीं विधानसभा के पाँचवें सत्र की अंतिम बैठक सवाई मानसिंह टाउन हॉल में हुई। इसके बाद विधानसभा की कार्यवाही नए भवन में प्रारम्भ हुई । राजस्थान विधानसभा का नया भव्य भवन राजस्थान की वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है और इसे देश की सर्वश्रेष्ठ विधानसभाओं में से एक माना जाता है ।यह राज्य की लोकतांत्रिक गरिमा और स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। आधुनिक सुविधाओं से युक्त यह भवन भारतीय संस्कृति, राजस्थान की कला और लोकतांत्रिक परंपराओं का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है।

विधानसभा के अनेक अनूठे कीर्तिमान

पिछले 75 वर्षों में राजस्थान विधानसभा ने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इस क्रम में विधान सभा का अभिन्न अंग रही राजस्थान की राज्यपाल प्रतिभा देवीसिंह पाटिल को भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद माननीय राष्ट्रपति बनने का सौभाग्य मिला। इसी प्रकार सदन के सदस्य और राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रहें भैरोंसिंह शेखावत के साथ ही विधानसभा सदस्य रहें जगदीप धनखड़ को भारत के दूसरे सबसे सर्वोच्च संवैधानिक पद माननीय उप राष्ट्रपति और संसद के उच्च सदन राज्यसभा के सभापति के पद पर आसीन होने का अवसर मिला। इसी क्रम में दूसरी बार लोकसभा के अध्यक्ष बने वर्तमान लोकसभाष्यक्ष ओम बिरला भी राजस्थान विधानसभा के सदस्य रहें हैं। इसी तरह राजस्थान में एक से अधिक बार विधायक और विधानसभाध्यक्ष रहें रामनिवास मिर्धा राज्यसभा के उप सभापति रहें हैं। राजस्थान विधानसभा के कई अन्य माननीय सदस्य,भारतीय संसद के उच्च सदन राज्यसभा और निचले सदन लोकसभा के सदस्य भी निर्वाचित हुए है और कई सदस्यों को केन्द्रीय मंत्रिपरिषद का सदस्य तथा राज्यों के राज्यपाल और उपराज्यपाल आदि बनने का सौभाग्य भी मिला है। राजस्थान विधानसभा में कई बार विधायक और राज्य सरकार में वरिष्ठ मंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष रहने वाले गुलाब चंद कटारिया वर्तमान में पंजाब के राज्यपाल और केन्द्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के प्रशासक हैं । राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी, शिव चरण माथुर, जगन्नाथ पहाड़िया के साथ ही राज्य मंत्रिमंडल की वरिष्ठ महिला मंत्री रही कमला बेनीवाल, विधायक और केन्द्रीय मंत्री रहें पंडित नवल किशोर शर्मा आदि भी विभिन्न प्रदेशों में राज्यपाल रहें हैं। इनके अलावा प्रदेश के वरिष्ठ विधायक रहें गोविन्द सिंह गुर्जर भी उप राज्यपाल बने थे ।

राजस्थान के संसदीय इतिहास में मोहन लाल सुखाड़िया का नाम सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहने के कीर्तिमान के साथ दर्ज है। वहीं प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी के नाम लगातार दस बार विधानसभा चुनाव जीतने का अटूट रिकॉर्ड है। राजस्थान की पहली महिला विधानसभा अध्यक्ष बनी सुमित्रा सिंह नौ बार विधायक रहीं। राज्य में कई अन्य आठ बार से छह बार तक प्रदेश के विधायक रहें हैं और अभी भी सदन के सदस्य है । राज्य विधान सभा के इतिहास में एक अभूतपूर्व रिकॉर्ड यह भी रहा है कि वर्ष 2003-2008 के मध्य राज्य की राज्यपाल (प्रतिभा पाटिल), मुख्यमंत्री (वसुंधरा राजे) और विधानसभाध्यक्ष (सुमित्रा सिंह ) तीनों ही महिला थी । इसके अलावा कई नेताओं की पत्नियाँ, परिवारजन दूसरी और तीसरी पीढ़ियों के पुत्र-पुत्रियों और निकट सम्बंधियों ने भी राज्य विधान सभा के सदस्य के रूप में अपने अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है।

विधानसभा ने लगाई कई कानूनों पर मुहर

राजस्थान विधानसभा का महिलाओं, युवाओं,अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा देने में उल्लेखनीय योगदान रहा है। विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगातार बढ़ा है और अनेक महिला विधायकों ने सदन में प्रभावशाली भूमिका निभाई है। सामाजिक समावेशन और लोकतांत्रिक सहभागिता की यह प्रवृत्ति राज्य की लोकतांत्रिक परिपक्वता को दर्शाती है। राजस्थान विधानसभा में पिछलें 75 वर्षों में अनेक महत्वपूर्ण विधेयकों और कानूनों को पारित किया गया है, जिनका सीधा प्रभाव राज्य के विकास पर पड़ा है। राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम- 1952, राजस्थान जमींदारी एवं बिस्वेदारी उन्मूलन अधिनियम-1959, राजस्थान पंचायत समिति एवं जिला परिषद अधिनियम-1959, राजस्थान प्राथमिक शिक्षा अधिनियम-1964, राजस्थान लोकायुक्त एवं उप लोकायुक्त अधिनियम-1973, राजस्थान सूचना का अधिकार अधिनियम-2001, राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम – 2011 सहित अन्य महत्वपूर्ण कानून इसमें शामिल हैं।

विधानसभाध्यक्ष के रूप में कार्य संस्कृति को बनाया समृद्ध

मैंने विधानसभाध्यक्ष के रूप में दिसम्बर 2023 में कार्यभार सम्भालने के बाद पिछले ढाई वर्षों में विधान सभा की सत्रावधि और कार्य के घंटों में वृद्धि के साथ ही राज्य सरकार, राज्य के मुख्यसचिव,अतिरिक्त मुख्य सचिवों और प्रमुख सचिवों की बैठकें आयोजित कर सरकार के विभिन्न विभागों से सदस्यों के प्रश्नों के उत्तर समय पर दिलाने के प्रयासों को प्राथमिकता दी है जिसके फलस्वरूप पिछले सत्र में 97 प्रतिशत प्रश्नों के उत्तर आए और आगे इसे सौ प्रतिशत तक बढ़ाने का प्रयास है । साथ ही विधान सभा सत्र से पूर्व संसद की तर्ज पर सर्वदलीय बैठक का आयोजन और सत्र के दौरान सदस्यों तथा अन्य सम्बंधितों के लिए लंच ब्रेक की सुविधा शुरू करना और किसी मुद्दे पर सदन में गतिरोध होने पर दोनों पक्षों को अपने चेम्बर में बुला कर आपसी संवाद से उसका समाधान निकालने आदि प्रयास भी किए है।राजस्थान विधानसभा ने वर्तमान युग की तकनीकी प्रगति के साथ सामंजस्य स्थापित कर अपनी कार्यप्रणाली का आधुनिकीकरण भी किया है। विधानसभा की कार्यप्रणाली को पूर्णतः डिजिटल और पेपरलेस बनाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास किए गए है । ई-विधान (नेवा) प्रणाली, डिजिटल दस्तावेज़ीकरण, ऑनलाइन प्रश्नोत्तर, इलेक्ट्रॉनिक सूचना प्रणाली तथा अभिलेखों के डिजिटलीकरण जैसी पहलें विधानसभा की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और दक्षता को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग से विधायी कार्य अधिक व्यवस्थित, त्वरित और पर्यावरण-अनुकूल बने हैं। संसद की नेवा योजना के तहत विधानसभा को पेपरलेस बनाने के प्रयासों में सफलता मिली है। सदन में सभी 200 विधायकों की सीट के सामने कंप्यूटर टेबलेट्स लगाए गए है। उनके आवास पर भी लैपटॉप और प्रिंटर की व्यवस्था की गई है । कार्यसूची, प्रश्न, उत्तर, विधेयक, संशोधन और अन्य दस्तावेजों को डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराने पर विशेष बल दिया गया, ताकि विधानसभा की कार्यवाही अधिक दक्ष, पारदर्शी और पर्यावरण-अनुकूल बन सके। साथ ही विधानसभा की सभी कमेटियों की बैठकों में विधायकों के डिजिटल हस्ताक्षर भी शुरू कराये गए है। सभी विधायकों को सदन में बोलने और अपने निर्वाचन क्षेत्रों की समस्याएँ रखने का पर्याप्त अवसर दिया जा रहा है । राजनीतिक दलों से भी अपेक्षा की गई कि वे अपने अधिकाधिक सदस्यों को चर्चा में भाग लेने का अवसर दें ताकि विधानसभा वास्तव में जनभावनाओं का प्रतिबिम्ब बन सके।

विभिन्न समितियों को बनाया प्रभावी

विधानसभा की विभिन्न समितियां जो कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का “लघु सदन” है इसमें सदस्य विधायकों की सक्रियता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया है । समिति अध्यक्षों के साथ नियमित बैठकें आयोजित कर सदस्यों की उपस्थिति, जवाबदेही, समयबद्ध प्रतिवेदन तथा अनुशंसाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर फोकस जा रहा है।नवनिर्वाचित विधायकों के लिए संसदीय प्रक्रिया, नियमों, प्रश्नकाल, वित्तीय कार्यवाही और विधायी प्रक्रिया से संबंधित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए ताकि विधायक संसदीय नियमों की बेहतर समझ विकसित कर जनहित के विषयों को अधिक प्रभावी ढंग से सदन में उठा सकें। इससे विधानसभा की कार्यवाही की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है।

युवा संसद और अन्य आयोजन

लोकतन्त्र के साथ युवा पीढ़ी को जोड़ने के उद्देश्य से युवा संसद, विद्यार्थियों के विधानसभा भ्रमण तथा मॉक विधानसभा जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया गया है। यह पहल भविष्य के जागरूक नागरिक और उत्तरदायी जनप्रतिनिधि तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। विधानसभा में विभिन्न देशों के संसदीय अधिकारियों एवं प्रतिभागियों के अध्ययन भ्रमण दौरे भी हुए, जिससे राजस्थान विधानसभा की कार्यप्रणाली का वैश्विक स्तर पर सम्मान बढ़ा है तथा संसदीय अनुभवों का आदान-प्रदान संभव हुआ है । समाचार पत्रों, टीवी चैनल्स, डिजिटल माध्यमों और विधानसभा के आधिकारिक यू ट्यूब चैनल पर कार्यवाही के प्रसारण से नागरिकों की विधानसभा की कार्यवाही तक पहुँच भी पहले की अपेक्षा अधिक आसान हुई है।

राष्ट्र मंडलीय संसदीय मंच के सम्मेलन

मैंने देश विदेश में आयोजित राष्ट्र मंडलीय संसदीय मंच (सीपीए ) के समय समय पर हुए विभिन्न सम्मेलनों में सहभागिता की और राजस्थान विधानसभा में की जा रही नवीन संसदीय पहलों और नवाचारों की जानकारियां साँझा की जिसकी सभी ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की ।

विधानसभा में किए कई नवाचार

राजस्थान विधानसभा के सदन के सम्पूर्ण परिवेश को राज्य की राजधानी पिंक सिटी जयपुर के तर्ज पर गुलाबी कारपेट से सुसज्जित किया है । विधानसभा को केवल विधायी कार्यों तक सीमित न रखकर उसे आधुनिक, तकनीक-सक्षम, जनसहभागी, शोध-आधारित और लोकतांत्रिक मूल्यों के संवर्धन का केंद्र बनाने की दिशा में कई नवाचार किए हैं। विधानसभा के गठन के बाद पहली बार विधानसभा का विशेष प्रतीक चिह्न (लोगो ) बनाया गया है। साथ ही विधानसभा के बाहरी और अंदरूनी प्रवेश द्वारों का नामाकरण कराया गया है । इसके अलावा विधानसभा के डिजिटल म्यूजियम और राजनैतिक आख्यान संग्रहालय का अपग्रेडेशन करवा उसे जन-दर्शन के लिए खोला गया है और उसमें राजस्थान के गठन पूर्व से अब तक के इतिहास और विकास की गाथा के साथ ही संविधान गैलेरी और वन्दे मातरम् गैलेरी का निर्माण आदि कार्य कराये गए है । इन गैलरियों को अब तक 50 हजार से अधिक लोग देख चुके है । विधानसभा परिसर में कारगिल स्मृति वाटिका के साथ ही नक्षत्र और हर्बल वाटिकाओं का निर्माण भी कराया गया है।

विधानसभा की गतिविधियों में राष्ट्रीय मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को प्रमुख स्थान दिया जा रहा है । विधानसभा की दैनेन्दिनी डायरी को प्रति वर्ष भारतीय चैत्र प्रतिपदा नव वर्ष से प्रकाशित करने की परम्परा शुरू की गई है । इस वर्ष की दैनेन्दिनी में कालातीत और वर्तमान घटनाओं के चित्रों का सुंदर संयोजन किया गया है जिसमें राजस्थान के गठन पर सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा जयपुर के महाराजा मानसिंह द्वितीय को राजप्रमुख की शपथ दिलाने, देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु द्वारा राजस्थान विधानसभा को सम्बोधित करने के चित्रों के साथ ही अटल बिहारी वाजपेयी आदि के चित्र शामिल हैं । इसी प्रकार विधानसभा के वर्ष 2026 के अंग्रेजी कैलेंडर को “वंदे मातरम्” के 150वें वर्ष को समर्पित करने को उल्लेखनीय पहल की गई है।

विधानसभा भवन से सटे “कांस्टीट्यूट क्लब ऑफ़ राजस्थान” में भी विधायकों और क्लब सदस्यों के लिए आवश्यक सेवाओं का उन्नयन करा उसे शुरू कराया गया है,जिसके फलस्वरूप यह क्लब जयपुर का मोस्ट हेपनिंग स्पॉट बन गया है।

भावी योजनाओं की क्रियान्वित का संकल्प

इन कई नवाचारों के साथ राजस्थान विधानसभा परिसर में संसद के संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष की तर्ज पर आधुनिक “सेंट्रल हॉल” विकसित करने तथा वर्तमान भवन की चौथी मंजिल पर स्थित प्रस्तावित विधानपरिषद के हाल का सदुपयोग करने की दृष्टि से वहाँ अत्याधुनिक सभागार (ऑडिटोरियम) के निर्माण की पहल की गई है और राज्य के वार्षिक बजट में इसकी घोषणा भी कराई गई है। प्रस्तावित सेंट्रल हॉल में सभी विधायकों के बैठने और कॉफ़िटेरिया की व्यवस्था,राष्ट्रीय विभूतियों के चित्र, राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत तथा लोकतांत्रिक इतिहास को प्रदर्शित करने की योजना है। नया अत्याधुनिक सभागार (ऑडिटोरियम) युवा संसद, कार्यशालाओं, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों तथा संसदीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों के आयोजन का केंद्र बनेगा। राजस्थान विधानसभा में किए जा रहें इन नवाचारों का मूल उद्देश्य विधानसभा को अधिक आधुनिक, तकनीक-सक्षम, शोध-आधारित, पारदर्शी और जनोन्मुख बनाना है। ये प्रयास राजस्थान विधानसभा को केवल कानून बनाने वाली संस्था ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शिक्षा, जनसहभागिता और सुशासन के सशक्त केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम हैं।