बेटियां बोझ नहीं, बल्कि सम्मान और गर्व का प्रतीक

Daughters are not a burden, but a symbol of respect and pride

सौरभ वार्ष्णेय

भारत में दहेज प्रथा केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि हजारों बेटियों की जिंदगी निगलने वाला वह दानव बन चुकी है, जो आधुनिक शिक्षा, कानून और जागरूकता के बावजूद आज भी समाज की मानसिकता पर हावी है। हर वर्ष दहेज उत्पीडऩ, आत्महत्या और हत्या के हजारों मामले सामने आते हैं, लेकिन कुछ दिनों की चर्चा के बाद सब कुछ फिर सामान्य हो जाता है। हाल ही में चर्चित द्विशा कांड को सीबीआई जांच के लिए सौंपा जाना इसी कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि समाज और व्यवस्था दोनों अभी भी इस अपराध को रोक पाने में पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं।समय आ गया है कि समाज यह समझे कि बेटियां बोझ नहीं, बल्कि सम्मान और गर्व का प्रतीक हैं। जिस दिन दहेज को सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं बल्कि शर्म का विषय माना जाने लगेगा, उसी दिन एक आदर्श समाज की शुरुआत होगी।

दहेज की समस्या की जड़ केवल लालच नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा की विकृत सोच है। विवाह को आज भी कई परिवार सौदे की तरह देखते हैं, जहां लड़के की नौकरी, वेतन और हैसियत के आधार पर कीमत तय होती है। दुखद यह है कि शिक्षित और संपन्न वर्ग भी इस मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाया है। माता-पिता अपनी बेटियों की शादी के लिए जीवनभर की जमा पूंजी खर्च कर देते हैं, फिर भी उत्पीडऩ समाप्त नहीं होता।

द्विशा कांड जैसे मामले इसलिए अधिक भयावह बन जाते हैं क्योंकि वे समाज के उस चेहरे को सामने लाते हैं, जहां कानून का डर कमजोर और लालच की भूख मजबूत दिखाई देती है। जब किसी बेटी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होती है और परिवार न्याय के लिए दर-दर भटकता है, तब लोगों का भरोसा व्यवस्था से उठने लगता है। ऐसे मामलों की ष्टक्चढ्ढ जांच इसलिए जरूरी मानी जाती है क्योंकि आम जनता निष्पक्ष और पारदर्शी जांच चाहती है।

हालांकि केवल जांच एजेंसी बदल देने से समस्या समाप्त नहीं होगी। आवश्यकता है कि दहेज विरोधी कानूनों को और प्रभावी बनाया जाए तथा उनकी निष्पक्षता भी सुनिश्चित हो। तेज सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बननी चाहिए ताकि पीडि़त परिवारों को वर्षों तक न्याय का इंतजार न करना पड़े। साथ ही झूठे मामलों को भी रोकना आवश्यक है, ताकि कानून की विश्वसनीयता बनी रहे।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव समाज की सोच में आना चाहिए। बेटियों को बोझ और बेटों को “कमाई का साधन” समझने वाली मानसिकता जब तक समाप्त नहीं होगी, तब तक दहेज का दानव जीवित रहेगा। विवाह को दिखावे और प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनाने की बजाय सादगी और समानता का संस्कार विकसित करना होगा। स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संगठनों को दहेज विरोधी अभियान लगातार चलाने चाहिए।

आज जरूरत केवल कानून की नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति की है। हर परिवार को यह संकल्प लेना होगा कि न दहेज देंगे और न लेंगे। जब समाज स्वयं दहेज मांगने वालों का बहिष्कार करेगा, तभी इस दानव का अंत संभव होगा। अन्यथा द्विशा जैसे कांड बार-बार देश को झकझोरते रहेंगे और बेटियों की चीखें व्यवस्था की फाइलों में दबती रहेंगी।

क्या आदर्श समाज दहेज को ना बोलेगा?
भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का पवित्र संबंध माना जाता है। लेकिन इस पवित्र रिश्ते पर दहेज जैसी कुप्रथा ने गहरा दाग लगा दिया है। आधुनिकता, शिक्षा और कानूनों के बावजूद दहेज की मांग आज भी समाज में अनेक परिवारों की पीड़ा का कारण बनी हुई है। सवाल यह है कि क्या हमारा समाज कभी सच में दहेज को पूरी तरह ना कह पाएगा?

दहेज प्रथा ने न केवल बेटियों को बोझ समझने की मानसिकता को बढ़ावा दिया है, बल्कि अनेक परिवारों को आर्थिक और मानसिक संकट में भी धकेला है। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं। कई बार दहेज की मांग पूरी न होने पर बेटियों को प्रताडऩा, हिंसा और यहां तक कि मौत का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।

सरकार ने दहेज निषेध कानून बनाए हैं, लेकिन केवल कानूनों से समस्या समाप्त नहीं होती। असली बदलाव समाज की सोच बदलने से आएगा। जब तक लोग दहेज को प्रतिष्ठा और सामाजिक हैसियत से जोड़कर देखेंगे, तब तक यह कुरीति जीवित रहेगी। दुख की बात यह है कि पढ़े-लिखे और संपन्न वर्गों में भी दहेज की मांग किसी न किसी रूप में जारी है। कहीं इसे उपहार का नाम दिया जाता है तो कहीं रीति-रिवाज कहकर उचित ठहराया जाता है।

आदर्श समाज वही होगा जहां बेटी और बेटा समान माने जाएं, जहां विवाह व्यापार नहीं बल्कि संस्कार बने। इसके लिए युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। यदि युवा स्वयं दहेज लेने और देने से इनकार कर दें, तो यह प्रथा काफी हद तक समाप्त हो सकती है। कई जागरूक परिवार और सामाजिक संगठन इस दिशा में सकारात्मक पहल भी कर रहे हैं। सादगीपूर्ण विवाह और दहेज मुक्त शादी का संदेश समाज में नई उम्मीद जगा रहा है।

शिक्षा भी इस लड़ाई का बड़ा हथियार है। बच्चों को बचपन से ही समानता, सम्मान और नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी जानी चाहिए। मीडिया और सामाजिक मंचों को भी दहेज विरोधी अभियानों को मजबूती देनी होगी। समाज में ऐसे उदाहरणों को सम्मान मिलना चाहिए जो बिना दहेज विवाह कर एक नई मिसाल पेश करते हैं।

दहेज केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक समस्या है। इसे समाप्त करने के लिए हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जब परिवार, समाज और युवा मिलकर यह संकल्प लेंगे कि विवाह में दहेज का कोई स्थान नहीं होगा, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।