जेनेरिक दवाओं का गोरखधंधा

Generic drug racket

अशोक भाटिया

मैंने डॉक्टर की लिखी दवा पैनम डी अपने मेडिकल स्टोर से खरीदी तो वह छपे भाव में मिली और उसे ही जेनेरिक रूप में ऑन लाइन मंगवाई तो 51 % कम में मिली यानि वह जेनेरिक थी । एक ही दवा को लेकर अलग – अलग जेनेरिक दवाइयों की दुकान पर गया। मैंने पाया कि एक ही दवा अलग – अलग दुकान पर अलग – अलग नामों से व भावों से बिक रही है। डायबिटीज में काम आने वाली दवा ‘ इनवोकाना ‘ का भाव 690 रुपया था उसके बन्द होने के बाद उसी साल्ट की जेनेरिक दवाई अनेक नामों से आने लगी । उनमें भी भाव 690 के लगभग ही लिखा होता है , अब अलग – अलग विक्रेता उसे 230 से लेकर 350 तक बेचते है । यह लेखक का स्वयं का अनुभव है । यही नहीं 20 रुपये की दवा की कीमत भी 80 रूपया लिखा होता है। यह तो 1 -2 अनुभव लिखे है पर ऐसे कई केस पता करने में पता करने पर पाया कि जेनेरिक दवाओं के प्रिंट रेट यानी इन दवाओं पर छपने वाली कीमत पर कोई नियंत्रण नहीं है।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के जरिये देश के सभी तबकों के नागरिकों के लिए समुचित चिकित्सा की उपलब्धता सुनिश्चित करने का इरादा केंद्र सरकार पहले ही जता चुकी है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जनसंवाद कार्यक्रम ‘मन की बात’ में जेनेरिक दवाओं के संबंध में कुछ बातें कही थीं। अब उन्होंने एक अस्पताल के उद््घाटन कार्यक्रम के अवसर पर इस संबंध में कानून लाने का संकेत दिया है। उन्होंने कहा, ‘डॉक्टर उपचार के दौरान इस तरह से पर्चे पर लिखते हैं कि गरीब लोग उनकी लिखावट को नहीं समझ पाते हैं और फिर लोगों को निजी स्टोर से अधिक कीमत पर दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। हम एक ऐसा कानूनी ढांचा लाएंगे जिसके तहत अगर कोई डॉक्टर पर्चा लिखता है, तो उसे ऐसे लिखना होगा कि मरीज जेनेरिक दवाएं खरीद सकें और उन्हें कोई अन्य दवा न खरीदनी पड़े।’ पर देखा गया है कि ऐसा होता नहीं है .

सरकार मरीजों को सस्ती दवाएं उपलब्ध करवाने के लिए कानून में संशोधन करके डॉक्टर्स को मरीजों के लिए सिर्फ जेनेरिक दवा लिखना चाहिए न कि किसी विशेष ब्रांड या कंपनी की। इसके बाद भी मरीजों को सस्ती दवाएं मिलने लगेंगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है, क्योंकि जेनेरिक दवाओं के प्रिंट रेट यानी इन दवाओं पर छपने वाली कीमत पर कोई नियंत्रण नहीं है। आईएमए के सदस्य और मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर डॉक्टर हेमंत जैन ने भास्कर बताते है कि ब्रांडेड मेडिसिन पर फार्मासिस्ट को 5 से 20 प्रतिशत तक कमीशन मिलता है, पर जेनेरिक मेडिसिन की प्रिंट रेट और रीटेलर की खरीद कीमत में 50 गुना से 350 गुना तक का अंतर होता है। 10 पैसे की बी कॉम्प्लेक्स 35 रुपए तक में बिकती है। इसका आम जनता या मरीजों को उतना फायदा नहीं मिलता, जितना मिलना चाहिए। ऐसे में सरकार को जेनेरिक मेडिसिन के प्रिंट रेट पर भी लगाम लगाने की जरूरत है, वरना जनता को कोई फायदा नहीं होने वाला। आम तौर पर सभी दवाएं एक तरह का \”केमिकल सॉल्ट\’ होती हैं। इन्हें शोध के बाद अलग-अलग बीमारियों के लिए बनाया जाता है। जेनेरिक दवा जिस सॉल्ट से बनी होती है, उसी के नाम से जानी जाती है। जैसे- दर्द और बुखार में काम आने वाले पैरासिटामोल सॉल्ट को कोई कंपनी इसी नाम से बेचे तो उसे जेनेरिक दवा कहेंगे। वहीं, जब इसे किसी ब्रांड जैसे- क्रोसिन के नाम से बेचा जाता है तो यह उस कंपनी की ब्रांडेड दवा कहलाती है। चौंकाने वाली बात यह है कि सर्दी-खांसी, बुखार और बदन दर्द जैसी रोजमर्रा की तकलीफों के लिए जेनरिक दवा महज 10 पैसे से लेकर डेढ़ रुपए प्रति टैबलेट तक में उपलब्ध है। ब्रांडेड में यही दवा डेढ़ रुपए से लेकर 35 रुपए तक पहुंच जाती है।

खबर है कि सरकार की तरफ से अधिकारियों को इस संबंध में कानून बनाने के लिए कहा गया है। हालांकि प्रस्तावित कानून कैसा होगा और कब इसका मसौदा सामने आएगा, यह अभी साफ नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि प्रस्तावित कानून में जेनेरिक दवाएं न लिखने वाले डॉक्टरों पर सख्ती के प्रावधान किए जाएंगे। बहरहाल, इतना तो तय है कि सरकार जेनेरिक दवाओं का चलन बढ़ाने और महंगी दवाओं के जरिये अनुचित लाभ कमाने वाले डॉक्टरों, दवा-कंपनियों और विक्रेताओं पर लगाम लगाने के लिए कमर कस रही है।

यहां यह समझना जरूरी है कि जेनेरिक दवा क्या होती है। दरअसल, कोई भी दवा कंपनी जब किसी दवा को बनाती है, तो उसका एक यौगिक (फार्मूला) होता है जिसका सर्वाधिकार बीस वर्ष तक उसी कंपनी के पास सुरक्षित रहता है। मतलब यह कि बीस वर्ष तक उस दवा को केवल वही कंपनी बना सकती है, जिसने उसके यौगिक की रचना की है। बीस वर्ष के बाद दवा के फार्मूले को सार्वजनिक कर दिया जाता है और तब उसके अनुसार कोई भी कंपनी उस दवा को बनाने के लिए स्वतंत्र होती है। सार्वजनिक फार्मूले के तहत बनने वाली दवा ही जेनेरिक दवा कहलाती है।

फार्मूला सार्वजनिक होने के कारण जेनेरिक दवाएं सस्ती होती हैं। जबकि जो फार्मूला सार्वजनिक नहीं होता, उससे निर्मित दवाएं केवल एक कंपनी द्वारा बनाए जाने के कारण, बाजारी प्रतिस्पर्धा के अभाव में, काफी महंगी मिलती हैं। उदाहरण के तौर पर, सामान्य बुखार के लिए प्रयुक्त होने वाली दवा पैरासिटामाल एक जेनेरिक दवा है, इस नाते बाजार में यह सब जगह इसी एक नाम से मिलती है और इसकी कीमत भी काफी कम होती है। मगर, इसी केजैसे प्रभाव वाली बुखार की दूसरी कई दवाएं जेनेरिक न होने के कारण इससे महंगी मिलती हैं। यह तो सामान्य बुखार की दवाओं की बात है, बड़ी-बड़ी बीमारियों में प्रयुक्त होने वाली जेनेरिक और गैर-जेनेरिक दवाओं की कीमतों के बीच तो कई गुने का अंतर देखने को मिलता है।

दरअसल, अब समस्या यह है कि जब कोई व्यक्ति डॉक्टर के पास जाता है, तो प्राय: वह सस्ती जेनेरिक दवाएं लिखने के बजाय समान प्रभाव वाली महंगी गैर-जेनेरिक या ब्रांडेड दवाएं लिख देता है। साथ ही, अक्सर हर डॉक्टर अपनी जान-पहचान के दो-एक दवा-विक्रेताओं के नाम भी सुझाते हुए वहीं से दवा लेने की सलाह दे डालता है। मरीज जो डॉक्टर को अपना भगवान माने बैठे होता है, वह बिना कोई सवाल-जवाब किए डॉक्टर की बताई हुई जगह से दवा खरीद लेता है। अब उस दवा-विक्रेता से डॉक्टर का कमीशन तय होता है। जितने अधिक मरीज डॉक्टर उस दवा-विक्रेता के पास भेजता है, डॉक्टर को कमीशन के रूप उतनी ही अधिक प्राप्ति होती है। दवा बनाने वाली कंपनी से लेकर डॉक्टरों और दवा-विक्रेताओं की मुनाफाखोरी के इस पूरे मकड़जाल में मरीज उलझ कर रह जाता है और उसे कुछ पता भी नहीं चलता कि माजरा क्या है। जो दवाएं उसे काफी कम कीमत में मिल सकती हैं, जानकारी के अभाव में वह उन दवाओं के लिए अधिक कीमत दे आता है। प्राय: मरीज इन सब विषयों में डॉक्टरों से कुछ सवाल भी नहीं कर पाते, लेकिन अगर किसी जागरूक व्यक्ति ने कभी गैर-जेनेरिक दवाओं को लेकर कोई सवाल कर दिया और जेनेरिक दवा लिखने की मांग कर दी, तो डॉक्टर नाराज हो जाते हैं। उनका कहना होता है कि उन्होंने जो दवा लिखी है वही फायदेमंद है और अगर मरीज ने अपने मन से दवा ली तो उसके हानि-लाभ का जिम्मेदार वह खुद होगा। इस तरह की बातों के बाद मरीज अक्सर डर जाते हैं और डॉक्टर के एक-एक निर्देश का अनुपालन करते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस तरह मरीजों का भयादोहन करके डॉक्टर और दवा-विक्रेता पूरी सांठगांठ से दवाओं की मुनाफाखोरी का बड़ा गोरखधंधा चला रहे हैं।

वैसे, जेनेरिक दवाओं को लेकर जमीनी स्तर पर लंबे समय से काम कर रहे स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशुतोष कुमार सिंह एक अलग ही समस्या की तरफ ध्यान आकर्षित करते हैं। उनका कहना है कि देश में नब्बे प्रतिशत दवाएं जेनेरिक हैं, मगर उन्हें ब्रांडेड के रूप में बेचा जा रहा है। सरकार को इस तरह की धोखाधड़ी बंद करने के लिए कदम उठाने की जरूरत है।

अब सरकार अगर जेनेरिक दवाओं के लिए कोई कानून लाती है, तो उसे उपर्युक्त सभी बातों पर विचार करना होगा। मोटे तौर पर संभावित कानून में कुछ ऐसे प्रावधान किए जाने चाहिए। पहला, यह कि जो भी दवा जेनेरिक हो, उस पर मोटे अक्षरों में जेनेरिक लिखा रहे। दूसरा, डॉक्टर मरीज को यदि कोई दवा बाहर से लिखते हैं, तो अपनी अबूझ लिखावट के बजाय साफ-साफ शब्दों में लिखें जिसे मरीज भी पढ़ सकें। इसके अलावा यह प्रावधान भी किया जा सकता है कि यदि किसी बीमारी की जेनेरिक दवा होते हुए भी डॉक्टर उसके लिए गैर-जेनेरिक दवा लिखते हैं, तो उसका कारण भी स्पष्ट करें।जेनेरिक दवाइयों पर वास्तविक मूल्य छापने का प्रावधान होना चाहिए .

दवा-विक्रेताओं के लिए जेनेरिक दवाएं रखना आवश्यक किया जाए। और जो इन नियमों का पालन न करे, उसके लिए कठोर सजा का प्रावधान हो। इसके अलावा और भी अनेक प्रावधान किए जा सकते हैं। लेकिन यह सब कुछ तभी कारगर और प्रभावी होगा जब आम लोगों में इस संबंध में जागरूकता आएगी; उन्हें जेनेरिक और गैर-जेनेरिक दवाओं का मतलब और इनके बीच का अंतर पता होगा। इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाए जाने की जरूरत है। आम लोगों तक सरल भाषा में जेनेरिक और गैर-जेनेरिक दवाओं की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए कुछ व्यवस्था बनाने पर भी विचार किया जा सकता है। इस तरह की लघु पुस्तिकाएं आदि वितरित की जा सकती हैं। इसके अलावा, जेनेरिक और गैर-जेनेरिक दवाओं के संबंध में जागरूकता के लिए और भी हरसंभव प्रयत्न सरकार को करने चाहिए।