मलमास की परंपरा और सनातन का सांस्कृतिक प्रवाह

The tradition of Malmas and the cultural flow of Sanatan

महेन्द्र तिवारी

भारतीय कालगणना केवल तिथियों और महीनों की गणना भर नहीं है, बल्कि वह प्रकृति, खगोल, धर्म और मानव जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने की एक अद्भुत व्यवस्था भी है। इसी व्यवस्था का एक विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है अधिक मास, जिसे मलमास तथा पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। वर्ष 2026 में यह पवित्र काल 17 मई से 15 जून तक रहेगा और इस बार यह ज्येष्ठ महीने में पड़ रहा है, इसलिए इसे अधिक ज्येष्ठ मास कहा जाएगा। यह संयोग विशेष माना जा रहा है क्योंकि ज्येष्ठ मास में अधिक मास का आगमन बहुत लंबे अंतराल के बाद हो रहा है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार ऐसा योग पुनः लगभग 2037 में बनेगा। इस कारण 2026 का पुरुषोत्तम मास धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारतीय पंचांग चंद्र और सूर्य दोनों की गति पर आधारित है। चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है जबकि सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का। दोनों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर रह जाता है। यही अंतर 3 वर्षों में लगभग 1 महीने के बराबर हो जाता है। इस असंतुलन को ठीक करने के लिए पंचांग में एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है। यह व्यवस्था भारतीय ज्योतिष और खगोल विज्ञान की अद्भुत सूझबूझ को दर्शाती है। अधिक मास का उद्देश्य केवल तिथियों का संतुलन नहीं, बल्कि मनुष्य को जीवन की भागदौड़ से थोड़ा विराम देकर आत्मिक उन्नति की ओर ले जाना भी है।

प्राचीन ग्रंथों में अधिक मास को पहले उपेक्षित माना गया था। किसी भी देवता ने इसे स्वीकार नहीं किया। तब यह मास भगवान विष्णु के पास पहुंचा। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर पुरुषोत्तम मास घोषित किया। तभी से यह महीना विष्णु भक्ति, जप, तप, दान और साधना का श्रेष्ठ काल माना जाने लगा। धार्मिक मान्यता है कि इस महीने में किया गया पुण्य कई गुना फल देता है। यही कारण है कि लोग इस दौरान व्रत, कथा, भागवत पाठ, गीता अध्ययन और दान-पुण्य में विशेष रुचि लेते हैं।

अधिक मास को सांसारिक कार्यों की अपेक्षा आध्यात्मिक साधना का समय माना गया है। इसलिए विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ, नया व्यापार आरंभ करना तथा नए घर या वाहन की खरीद को सामान्यतः टाल दिया जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि यह महीना अशुभ है। वास्तव में यह महीना बाहरी विस्तार को रोककर भीतर की यात्रा करने का अवसर देता है। भारतीय चिंतन में यह विचार अत्यंत गहरा है कि मनुष्य केवल भौतिक उपलब्धियों से पूर्ण नहीं होता। उसे समय-समय पर अपने भीतर लौटना भी आवश्यक है। पुरुषोत्तम मास इसी आंतरिक यात्रा का प्रतीक है।

इस अवधि में भगवान विष्णु की उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है। विष्णु सहस्रनाम का पाठ, गीता और भागवत का श्रवण, तुलसी पूजा, दीपदान, अन्नदान और जलदान को अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। पीले वस्त्रों का दान, गरीबों को भोजन कराना तथा गौसेवा का भी विशेष महत्व बताया गया है। अनेक लोग इस महीने में एक समय भोजन, मौन व्रत या नियमित जप का संकल्प लेते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इससे मन की अशांति कम होती है और व्यक्ति के भीतर संयम तथा धैर्य का विकास होता है।

वर्ष 2026 के पुरुषोत्तम मास की एक और बड़ी विशेषता बिहार के राजगीर में लगने वाला ऐतिहासिक मलमास मेला है। राजगीर प्राचीन काल से ही आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा है। यह नगर हिंदू, बौद्ध और जैन तीनों परंपराओं के लिए महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि मलमास के दौरान 33 करोड़ देवी-देवता राजगीर में निवास करते हैं। इसी विश्वास के कारण लाखों श्रद्धालु इस अवधि में वहां पहुंचते हैं। ब्रह्मकुंड और अन्य गर्म जलकुंडों में स्नान कर लोग पूजा और दान करते हैं।

राजगीर का मलमास मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि लोकजीवन, संस्कृति और परंपरा का विशाल उत्सव भी है। यहां साधु-संतों के प्रवचन, कथा, भजन, धार्मिक अनुष्ठान और लोककलाओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। बिहार सरकार और नालंदा जिला प्रशासन ने 2026 के मेले की तैयारी पहले से शुरू कर दी है। लाखों श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए आवास, यातायात और सुरक्षा की व्यवस्थाएं की जा रही हैं।

भारतीय समाज में अधिक मास का प्रभाव केवल धार्मिक जीवन तक सीमित नहीं रहता। इसका असर सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों पर भी पड़ता है। चूंकि इस दौरान मांगलिक कार्य स्थगित कर दिए जाते हैं, इसलिए विवाह और अन्य समारोह अगले महीनों में अधिक संख्या में होते हैं। इसी कारण वर्ष 2026 में रक्षाबंधन, नवरात्र और दीपावली जैसे त्योहार सामान्य समय से लगभग 20 दिन बाद आएंगे। यह परिवर्तन भारतीय पंचांग की गतिशीलता को दर्शाता है।

यदि गहराई से देखा जाए तो अधिक मास आधुनिक जीवन के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है। आज का मनुष्य निरंतर भागदौड़, तनाव और प्रतिस्पर्धा में उलझा हुआ है। उसके पास स्वयं से मिलने का समय कम होता जा रहा है। पुरुषोत्तम मास मानो यह संदेश देता है कि जीवन केवल उपलब्धियों की दौड़ नहीं है। कभी-कभी रुकना, स्वयं को समझना और भीतर की शांति को खोजना भी आवश्यक है। यही कारण है कि यह महीना केवल धार्मिक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण प्रतीत होता है।

भारतीय साहित्य और लोकसंस्कृति में भी अधिक मास का विशेष स्थान रहा है। लोकगीतों, कथाओं और पुराणों में इस महीने की महिमा का वर्णन मिलता है। गांवों में आज भी बुजुर्ग इस अवधि को संयम और साधना का समय मानते हैं। महिलाएं कथा और भजन में भाग लेती हैं, पुरुष मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में सेवा करते हैं तथा परिवारों में धार्मिक वातावरण बनता है। यह महीना समाज को सामूहिक रूप से आध्यात्मिकता की ओर मोड़ने का कार्य करता है।

वर्ष 2026 का अधिक ज्येष्ठ मास इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह परंपरा, खगोल विज्ञान और अध्यात्म तीनों को एक साथ जोड़ता है। एक ओर यह चंद्र और सूर्य गणना के बीच संतुलन स्थापित करता है, दूसरी ओर मनुष्य को आत्मिक संतुलन की ओर भी प्रेरित करता है। राजगीर का मेला इसकी सांस्कृतिक भव्यता को और अधिक जीवंत बना देता है। ऐसे समय में जब आधुनिक जीवन तेजी से बदल रहा है, पुरुषोत्तम मास भारतीय सभ्यता की उस गहरी चेतना की याद दिलाता है जिसमें समय केवल घड़ी की सुई नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा भी है।