सत्य भूषण शर्मा
भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे लोकतांत्रिक देश में नेताओं की तुलना होना कोई नई बात नहीं है। समय-समय पर देश के बड़े राजनीतिक व्यक्तित्वों की कार्यशैली, सोच, उपलब्धियों और नीतियों को लेकर चर्चा होती रही है। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे दो नेता हैं जिनकी तुलना अक्सर राजनीतिक मंचों, मीडिया बहसों और आम जनमानस में देखने को मिलती है। कोई नेहरू को आधुनिक भारत का निर्माता बताता है तो कोई मोदी को नए भारत का शिल्पकार कहता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या दोनों नेताओं की तुलना वास्तव में संभव और न्यायसंगत है?
सच्चाई यह है कि दोनों नेताओं ने अलग-अलग युगों में देश का नेतृत्व किया। दोनों के सामने चुनौतियाँ भी अलग थीं और देश की परिस्थितियाँ भी। इसलिए तुलना करने से पहले उस समय की पृष्ठभूमि को समझना बेहद जरूरी है।
जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश की बागडोर संभाली तब भारत आजाद तो हो चुका था, लेकिन विभाजन का दर्द, सांप्रदायिक दंगे, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और कमजोर अर्थव्यवस्था देश के सामने बड़ी चुनौतियाँ थीं। अंग्रेज भारत को आर्थिक रूप से कमजोर और संसाधनहीन छोड़कर गए थे। उस दौर में लोकतंत्र को स्थिर रखना ही अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी। नेहरू ने देश को वैज्ञानिक सोच और आधुनिकता की राह पर ले जाने का प्रयास किया। उन्होंने बड़े उद्योगों, सार्वजनिक उपक्रमों, भाखड़ा नांगल जैसे विशाल बांधों, आईआईटी, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों की स्थापना को प्राथमिकता दी। उनके सपनों का भारत एक आधुनिक, वैज्ञानिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र था।
नेहरू का मानना था कि मजबूत संस्थाएँ ही देश को लंबे समय तक स्थिरता दे सकती हैं। इसलिए उन्होंने संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को मजबूत करने का प्रयास किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने भारत को गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व दिलाया, जिससे भारत किसी एक महाशक्ति का समर्थक बनने के बजाय स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने में सफल रहा।
हालांकि नेहरू की नीतियों पर कई आलोचनाएँ भी हुईं। 1962 के चीन युद्ध में मिली हार को लेकर उनकी विदेश नीति पर गंभीर प्रश्न उठे। कश्मीर समस्या और अत्यधिक समाजवादी आर्थिक मॉडल को लेकर भी आलोचक उन्हें जिम्मेदार मानते हैं। फिर भी यह भी सत्य है कि उन्होंने जिस दौर में देश का नेतृत्व किया, वह राष्ट्र निर्माण का शुरुआती और सबसे कठिन समय था।
दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे समय में देश का नेतृत्व कर रहे हैं जब भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। आज तकनीक, डिजिटल क्रांति, सोशल मीडिया और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का युग है। जनता की अपेक्षाएँ भी पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी हैं। मोदी ने खुद को एक मजबूत और निर्णायक नेता के रूप में स्थापित किया है। उन्होंने जनसंपर्क और संचार कौशल के माध्यम से आम लोगों तक सीधा संवाद कायम किया।
मोदी सरकार ने डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, स्टार्टअप इंडिया, आत्मनिर्भर भारत और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के माध्यम से विकास की नई तस्वीर प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। सड़कों, एक्सप्रेस-वे, रेलवे, एयरपोर्ट, मेट्रो और डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में तेज़ी से बदलाव देखने को मिले हैं। भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है और वैश्विक मंचों पर उसकी उपस्थिति पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली दिखाई देती है।
विदेश नीति के क्षेत्र में भी मोदी सरकार ने भारत की छवि को मजबूत करने का प्रयास किया है। अमेरिका, यूरोप, मध्य एशिया और खाड़ी देशों के साथ संबंधों में नए आयाम देखने को मिले हैं। जी-20 जैसे वैश्विक आयोजनों में भारत की भूमिका को भी काफी सराहा गया।
लेकिन मोदी सरकार भी आलोचनाओं से अछूती नहीं रही। बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक ध्रुवीकरण, किसानों के मुद्दे और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। कुछ लोग मानते हैं कि देश में राजनीतिक संवाद पहले की तुलना में अधिक आक्रामक और विभाजित हुआ है। हालांकि समर्थकों का कहना है कि बड़े बदलावों के दौर में विरोध और बहस स्वाभाविक होती है।
यदि व्यक्तित्व की बात करें तो नेहरू और मोदी दोनों की शैली पूरी तरह अलग दिखाई देती है। नेहरू विद्वान, बौद्धिक और विचारप्रधान नेता थे। वे किताबों, विमर्श और संस्थागत राजनीति के प्रतीक माने जाते थे। वहीं मोदी जनभावनाओं को समझने वाले, प्रभावशाली वक्ता और चुनावी रणनीति के कुशल नेता माने जाते हैं। नेहरू का नेतृत्व अभिजात्य और वैचारिक छवि वाला था, जबकि मोदी खुद को सामान्य पृष्ठभूमि से उभरे जननेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
असल में किसी भी दो नेताओं की तुलना केवल लोकप्रियता या राजनीतिक समर्थन के आधार पर नहीं की जानी चाहिए। इतिहास में हर नेता की भूमिका उसके समय और परिस्थितियों से तय होती है। नेहरू ने स्वतंत्र भारत की नींव रखी, जबकि मोदी उस भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का दावा करते हैं। दोनों के समर्थक और आलोचक हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र निर्माण में दोनों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम नेताओं को लेकर अंधभक्ति या अंधविरोध से बचें। लोकतंत्र में किसी भी नेता का मूल्यांकन विकास, सामाजिक समरसता, लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक प्रगति और जनता के जीवन पर पड़े प्रभाव के आधार पर होना चाहिए। इतिहास किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की सतत यात्रा है। इसलिए नेहरू और मोदी दोनों को उनके समय, चुनौतियों और योगदान के संदर्भ में समझना ही सही दृष्टिकोण माना जा सकता है।





