सिंधु जल संधि: आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और बदलती कूटनीति

Indus Waters Treaty: Terrorism, National Security, and Evolving Diplomacy

राजेश जैन

भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को हुई सिंधु जल संधि को लंबे समय तक दुनिया के सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय जल समझौतों में गिना जाता रहा। यह संधि तीन युद्धों, कारगिल संघर्ष, संसद हमले, मुंबई हमले और दोनों देशों के बीच लगातार तनाव के बावजूद छह दशक तक कायम रही। लेकिन अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पहली बार इस संधि को स्थगित करने का फैसला लेकर स्पष्ट संदेश दिया कि आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय संबंध अब साथ-साथ नहीं चल सकते। ऐसे में यह विवाद अब केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं है। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून, जल संसाधन और दक्षिण एशिया की भविष्य की राजनीति जैसे कई आयाम जुड़ चुके हैं। हाल में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर, विदेश मंत्री इसहाक डार और पीपीपी नेता बिलावल भुट्टो जरदारी की तीखी प्रतिक्रियाओं के बाद सिंधु जल संधि एक बार फिर चर्चा में है।

जानिए, क्या है सिंधु जल संधि

सिंधु नदी प्रणाली में छह प्रमुख नदियां शामिल हैं-सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज। इन नदियों का जलग्रहण क्षेत्र भारत, पाकिस्तान, चीन और अफगानिस्तान तक फैला है तथा करोड़ों लोगों की आजीविका इन्हीं पर निर्भर करती है।

1947 के विभाजन के बाद पानी के बंटवारे को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद शुरू हो गया। 1948 में भारत द्वारा कुछ नहरों का पानी अस्थायी रूप से रोके जाने के बाद स्थिति गंभीर हुई। इसके समाधान के लिए विश्व बैंक ने मध्यस्थता की और करीब नौ वर्षों की लंबी बातचीत के बाद 1960 में कराची में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत रावी, ब्यास और सतलुज का उपयोग भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश जल उपयोग पाकिस्तान के हिस्से में गया। कुल जल प्रवाह का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान और लगभग 20 प्रतिशत भारत को मिला। यही वजह है कि भारत में समय-समय पर यह सवाल उठता रहा कि ऊपरी धारा वाला देश होने के बावजूद उसने अपेक्षाकृत अधिक उदारता क्यों दिखाई।

भारत ने क्या दिया और क्या पाया

सामान्य धारणा यह है कि भारत ने केवल पानी छोड़ा, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है। भारत ने पश्चिमी नदियों का अधिकांश जल उपयोग पाकिस्तान को दिया और उसके सिंचाई ढांचे के विकास में भी आर्थिक सहयोग किया। बदले में भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित सिंचाई, घरेलू उपयोग और जलविद्युत परियोजनाएं बनाने का अधिकार मिला, लेकिन पानी के प्राकृतिक प्रवाह को रोकने का अधिकार नहीं मिला। संधि के तहत स्थायी सिंधु आयोग का गठन किया गया, जिसके माध्यम से दोनों देश नियमित बैठकें करते थे, परियोजनाओं की जानकारी साझा करते थे और विवादों का समाधान बातचीत से निकालने की कोशिश करते थे। यही व्यवस्था छह दशकों तक इस संधि की सबसे बड़ी ताकत रही।

इसलिए बदली भारत की नीति

पिछले तीन दशकों में उरी, पठानकोट, पुलवामा और पहलगाम जैसे आतंकी हमलों ने भारत की सुरक्षा चिंताओं को लगातार बढ़ाया है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देता है और दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय समझौतों का लाभ भी उठाता है। पहलगाम हमले के बाद भारत सरकार ने पहली बार स्पष्ट रूप से कहा कि “आतंकवाद और सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते।” इसके बाद सिंधु जल संधि को स्थगित करने, जल संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान पर रोक लगाने और संयुक्त बैठकों को बंद करने जैसे कदम उठाए गए। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ विश्वसनीय और स्थायी कार्रवाई नहीं करेगा, तब तक यह नीति जारी रहेगी।

इसलिए परेशान है पाकिस्तान

पाकिस्तान की लगभग 80 प्रतिशत कृषि सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। पंजाब और सिंध प्रांत की खेती, खाद्यान्न उत्पादन तथा करोड़ों लोगों की आजीविका इसी जल पर आधारित है। यही कारण है कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर, विदेश मंत्री इसहाक डार और पीपीपी नेता बिलावल भुट्टो जरदारी ने भारत के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी।

हालांकि वास्तविकता यह भी है कि भारत के पास फिलहाल इतनी भंडारण क्षमता नहीं है कि वह पश्चिमी नदियों के पूरे जल प्रवाह को लंबे समय तक रोक सके। इसलिए वर्तमान रणनीति पानी रोकने की नहीं, बल्कि संधि के तहत मिलने वाली प्रशासनिक और तकनीकी सुविधाओं को स्थगित करने की है।

क्या भारत अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ रहा है?

पाकिस्तान का कहना है कि सिंधु जल संधि एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसे कोई भी पक्ष एकतरफा निलंबित नहीं कर सकता। दूसरी ओर, भारत का तर्क है कि किसी भी द्विपक्षीय समझौते की नींव पारस्परिक विश्वास पर टिकी होती है। यदि एक पक्ष लगातार आतंकवाद को बढ़ावा देता है और दूसरे देश की सुरक्षा को चुनौती देता है, तो इसे परिस्थितियों में मूलभूत परिवर्तन माना जा सकता है। भारत का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा किसी भी देश की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है और ऐसे में उपलब्ध कानूनी एवं रणनीतिक विकल्पों पर पुनर्विचार करना उसका अधिकार है। यही भारत की वर्तमान कूटनीतिक दलील का आधार है।

पानी बन रहा है रणनीतिक शक्ति

इक्कीसवीं सदी में पानी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि रणनीतिक संपत्ति भी बनता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी, घटते भूजल स्तर और अनियमित मानसून ने जल को भविष्य के सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक संसाधनों में शामिल कर दिया है। भारत के लिए भी यह अवसर है कि वह जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में पश्चिमी नदियों पर अपने वैध अधिकारों का बेहतर उपयोग करे। जलविद्युत परियोजनाओं, सिंचाई और जल प्रबंधन में निवेश बढ़ाकर ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास को नई गति दी जा सकती है।

आगे की राह

भारत के सामने चुनौती दोहरी है। एक ओर उसे आतंकवाद के खिलाफ कठोर संदेश देना है, तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय मंच पर जिम्मेदार और कानून का सम्मान करने वाले राष्ट्र की छवि भी बनाए रखनी है। इसलिए हर कदम कानूनी, तकनीकी और कूटनीतिक रूप से मजबूत होना चाहिए। दूसरी ओर, पाकिस्तान के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है। यदि वह आतंकवाद को विदेश नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल करता रहेगा, तो उसके प्रभाव केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि जल, व्यापार, कूटनीति और क्षेत्रीय सहयोग जैसे सभी क्षेत्रों पर पड़ेंगे।

सारांश यह है कि सिंधु जल संधि छह दशकों तक भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद का सबसे मजबूत पुल रही। लेकिन बदलते सुरक्षा परिदृश्य ने इसकी राजनीतिक और रणनीतिक भूमिका को पूरी तरह बदल दिया है। आज यह केवल पानी का समझौता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीति और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। भारत का संदेश स्पष्ट है कि आतंकवाद और सामान्य संबंध एक साथ नहीं चल सकते। वहीं, यह भी उतना ही आवश्यक है कि जल जैसे जीवनदायी संसाधन को अनावश्यक संघर्ष का माध्यम बनने से बचाया जाए। यदि भविष्य में आतंकवाद समाप्त होता है और दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल होता है, तो सिंधु की धाराएं फिर सहयोग और स्थिरता की प्रतीक बन सकती हैं।