हमारी भाषाएँ मर रही हैं, हम अंग्रेज़ी में उनका श्राद्ध कर रहे हैं

Our languages ​​are dying; we are performing their last rites in English

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

सुप्रीम कोर्ट का हालिया प्रश्न — क्या अंग्रेज़ी को भारत की स्वदेशी भाषा माना जा सकता है?—सिर्फ न्यायालय का सवाल नहीं, भारत की भाषाई चेतना पर दस्तक है। यह बहस अंग्रेज़ी के पक्ष-विपक्ष की नहीं, उस मानसिकता की है जिसने आज़ादी के आठ दशक बाद भी भाषा को आत्मसम्मान नहीं, हैसियत का पैमाना बना रखा है। ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ आई अंग्रेज़ी आज विश्वविद्यालयों, न्यायालयों, प्रशासन, विज्ञान, तकनीक और कॉरपोरेट जगत की प्रमुख भाषा है। करोड़ों भारतीय इसे शिक्षा और रोज़गार का माध्यम बना चुके हैं, इसलिए इसे पूरी तरह विदेशी कहना यथार्थ से मुंह मोड़ना होगा। पर क्या लंबे उपयोग से कोई भाषा स्वदेशी हो जाती है? यदि हाँ, तो स्वदेशी का आधार इतिहास होगा, संस्कृति या सुविधा? सुप्रीम कोर्ट ने भाषा नहीं, भारतीय आत्मविश्वास का प्रश्न उठाया है। वही आत्मविश्वास जिसने कभी संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल, हिंदी, बंगाली, मराठी, उड़िया, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, असमिया और सैकड़ों बोलियों के बल पर विश्व को ज्ञान दिया, लेकिन आज अपने ही देश में स्वयं को सिद्ध करने के लिए विदेशी भाषा का सहारा खोजता है।

इस प्रश्न का सबसे बड़ा कटघरा हमारी न्याय व्यवस्था है। संविधान के अनुच्छेद 348 के तहत सर्वोच्च न्यायालय और अधिकांश उच्च न्यायालयों की कार्यवाही व निर्णय आज भी अंग्रेज़ी में होते हैं। विडंबना यह है कि न्याय उसी नागरिक के लिए लिखा जाता है, जो उसकी भाषा नहीं समझता। स्वयं न्यायालय भी मान चुका है कि फैसलों और आदेशों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद आवश्यक है, क्योंकि न्याय तभी सार्थक है, जब वह जनता की भाषा में पहुंचे। फिर भी अदालतों में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व निर्विवाद है। लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ यदि जनता की भाषा से दूर रहेगा, तो न्याय और नागरिक के बीच दूरी बनी रहेगी। क्या केवल वर्षों के प्रयोग से अंग्रेज़ी स्वदेशी हो जाएगी, या न्याय व्यवस्था को भारतीय भाषाओं से जोड़ना ही लोकतांत्रिक सुधार होगा? यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं, न्याय तक समान पहुंच का है।

आज का सबसे कठोर सत्य यह है कि अंग्रेज़ी भारत में केवल भाषा नहीं, वर्गीय शक्ति का प्रतीक बन चुकी है। यही भाषा कुछ के लिए अवसरों का द्वार है, तो लाखों के लिए अदृश्य दीवार। महंगे विद्यालय, आईआईटी, आईआईएम, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और वैश्विक संस्थाएं इसे योग्यता की पहली शर्त मानती हैं। वहीं गांव का प्रतिभाशाली विद्यार्थी, दलित-बहुजन युवा और मातृभाषा में शिक्षित लाखों छात्र क्षमता नहीं, भाषा की बाधा से पीछे छूट जाते हैं। तीन-भाषा नीति पर वर्षों से जारी बहस और दक्षिण भारत का प्रतिरोध इसी भाषाई वर्चस्व की आशंका का संकेत है। यदि अंग्रेज़ी को स्वदेशी मान लेने से यह असमानता और गहरी होती है, तो क्या हम नई गुलामी को ही वैधता नहीं दे रहे? कभी सत्ता तलवार से चलती थी, आज भाषा के प्रमाणपत्र से चलती है।

इतिहास इस बहस का सबसे ईमानदार साक्षी है। 1835 में लॉर्ड मैकॉले ने स्पष्ट लिखा था कि उसका उद्देश्य ऐसे भारतीय तैयार करना है, जो रक्त और रंग से भारतीय, लेकिन विचार, नैतिकता, रुचि और बुद्धि से अंग्रेज़ हों। यह केवल शिक्षा नीति नहीं, मानसिक उपनिवेश की योजना थी। स्वतंत्र भारत ने राजनीतिक आज़ादी तो पा ली, पर भाषाई स्वाधीनता का संघर्ष अधूरा रह गया। समय के साथ अंग्रेज़ी का स्वरूप भी बदला है। आज हिंग्लिश, तम्लिश, बेंग्लिश जैसी मिश्रित भाषाएं बताती हैं कि भारत हर भाषा को अपना रंग दे सकता है। अंग्रेज़ी भी अब भारतीय अनुभवों से समृद्ध है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह बदलाव हमारी 22 अनुसूचित भाषाओं और सैकड़ों बोलियों की कीमत पर हो रहा है? यदि नई पीढ़ी मातृभाषा से पहले अंग्रेज़ी में सोचने लगे, तो यह केवल भाषा का नहीं, सांस्कृतिक स्मृति के क्षरण का संकेत होगा।

दुनिया का अनुभव भारत को स्पष्ट संकेत देता है। जापान ने जापानी, जर्मनी ने जर्मन, फ्रांस ने फ़्रांसीसी, चीन ने मंदारिन और इज़राइल ने पुनर्जीवित हिब्रू के बल पर ज्ञान, विज्ञान और राष्ट्रीय पहचान को सशक्त बनाया। इन देशों ने अंग्रेज़ी सीखी, उसका उपयोग किया, लेकिन उसे अपनी पहचान पर हावी नहीं होने दिया। भारत का मार्ग टकराव नहीं, संतुलन का होना चाहिए। नई शिक्षा नीति मातृभाषा आधारित शिक्षा पर बल देती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद, भारतीय भाषाओं में तकनीकी शब्दावली, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, विधि की पढ़ाई और बहुभाषी डिजिटल ज्ञान-संसाधन बताते हैं कि ज्ञान अब अंग्रेज़ी की कैद में नहीं है। फिर अंग्रेज़ी को स्वदेशी घोषित करने की जल्दबाज़ी क्यों? असली चुनौती अंग्रेज़ी को हटाना नहीं, भारतीय भाषाओं को उस स्तर तक पहुंचाना है, जहाँ किसी विद्यार्थी का भविष्य उसकी भाषा नहीं, प्रतिभा तय करे।

यहीं सुप्रीम कोर्ट का प्रश्न सबसे अधिक दूरदर्शी बन जाता है। यह हिंदी बनाम अंग्रेज़ी, उत्तर बनाम दक्षिण या किसी भाषा की श्रेष्ठता का विवाद नहीं, उस भारत की खोज है जहाँ हर बच्चा मातृभाषा में सोच सके, क्षेत्रीय भाषा से समाज से जुड़े और अंग्रेज़ी के माध्यम से दुनिया से संवाद करे। यही बहुभाषिक भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। यदि अंग्रेज़ी को स्वदेशी कहकर भारतीय भाषाओं की उपेक्षा हुई, तो लोकगीत, लोककथाएं, दर्शन, लोकविज्ञान, क्षेत्रीय साहित्य और हजारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृतियां हाशिए पर चली जाएंगी। लेकिन यदि अंग्रेज़ी वैश्विक अवसरों की भाषा और भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय जीवन की आत्मा बनें, तो वे प्रतिद्वंद्वी नहीं, परस्पर सहयोगी होंगी। भाषा का भविष्य प्रतिस्पर्धा नहीं, सह-अस्तित्व सुरक्षित करेगा।

दरअसल, सबसे बड़ा भ्रम यही है कि स्वदेशी का अर्थ केवल उत्पत्ति से है। भारत का इतिहास बताता है कि उसने अनेक संस्कृतियों, विचारों और भाषाओं को अपनाया, पर अपनी आत्मा कभी नहीं खोई। इसलिए न अंग्रेज़ी का विरोध समाधान है, न महिमामंडन। असली प्रश्न यह है कि निर्णय, ज्ञान और आने वाली पीढ़ी के सपनों की भाषा कौन होगी। यदि प्रशासन, न्याय, विज्ञान, चिकित्सा, शोध और तकनीकी शिक्षा भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होगी, तो अंग्रेज़ी कभी चुनौती नहीं बनेगी। लेकिन यदि भारतीय भाषाएं घर, कविता और उत्सव तक सिमट गईं, और अंग्रेज़ी सत्ता, ज्ञान व अवसर की भाषा बन गई, तो वही मानसिक असमानता लौटेगी, जिसकी नींव औपनिवेशिक शासन ने रखी थी। गुलामी केवल विदेशी शासन से नहीं आती, वह तब भी आती है, जब कोई समाज अपनी भाषा पर विश्वास खो देता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कोई भाषाई निर्णय नहीं दिया, बल्कि भारत के सामने एक मूल प्रश्न रख दिया—क्या भाषा केवल सुविधा का माध्यम होगी या राष्ट्रीय आत्मविश्वास का आधार? अंग्रेज़ी वैश्विक अवसरों का द्वार है, लेकिन भारत की सभ्यता, लोकज्ञान, संवेदना और सांस्कृतिक चेतना भारतीय भाषाओं में ही जीवित हैं। इसलिए न अंग्रेज़ी का विरोध समाधान है, न उसे स्वदेशी मानकर भारतीय भाषाओं का विकल्प बनाना। आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है, जहाँ न्याय जनता की भाषा में मिले, शिक्षा मातृभाषा में विकसित हो, तकनीक हर भारतीय भाषा को समान अवसर दे और अंग्रेज़ी दुनिया से संवाद का सेतु बने, प्रभुत्व का नहीं। अंततः यह बहस अंग्रेज़ी की नहीं, भारत के भाषाई आत्मविश्वास की है। जो राष्ट्र अपनी भाषाओं को सम्मान देता है, वही अपने ज्ञान, संस्कृति और भविष्य को भी सुरक्षित रखता है। भारत की वास्तविक भाषाई स्वतंत्रता अंग्रेज़ी को स्वदेशी सिद्ध करने में नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय जीवन का स्वाभाविक आधार बनाने में है।