क्या भारत विरोध ने पाकिस्तान को आर्थिक संकट में धकेला?

Did hostility towards India push Pakistan into an economic crisis?

महेन्द्र तिवारी

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के राजनीतिक सलाहकार राणा सनाउल्लाह का हालिया बयान दक्षिण एशिया की राजनीति में व्यापक चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि यदि पाकिस्तान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अंधे विरोध की नीति न अपनाता और भारत के साथ हाथ मिलाकर आगे बढ़ता, तो आज पाकिस्तान को कर्ज के लिए दर दर नहीं भटकना पड़ता। उन्होंने यह भी कहा कि भारत से मैत्रीपूर्ण संबंध होते तो पूरे क्षेत्र में शांति और स्थिरता का वातावरण बनता। किसी वरिष्ठ पाकिस्तानी नेता की ओर से इस प्रकार का आत्मविश्लेषण असामान्य माना जा रहा है क्योंकि दशकों से पाकिस्तान की राजनीतिक और सामरिक सोच का बड़ा हिस्सा भारत विरोध पर आधारित रहा है।

राणा सनाउल्लाह ने अपने बयान में वर्ष 2015 का उल्लेख किया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचानक लाहौर पहुंचे थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात की थी। उस समय इसे दोनों देशों के संबंधों में नई शुरुआत की संभावना के रूप में देखा गया था। लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद पठानकोट आतंकी हमला हुआ और उसके बाद दोनों देशों के संबंध फिर से तनावपूर्ण हो गए। राणा सनाउल्लाह का कहना है कि पाकिस्तान उस अवसर का लाभ उठाने में विफल रहा और इसके लिए स्वयं पाकिस्तान की राजनीतिक सोच तथा भारत विरोधी दृष्टिकोण जिम्मेदार रहा।

भारत और पाकिस्तान के संबंधों का इतिहास विभाजन के समय से ही जटिल रहा है। दोनों देशों ने अनेक युद्ध देखे, सीमा पर लगातार तनाव बना रहा और आतंकवाद के मुद्दे ने विश्वास की कमी को और गहरा किया। कश्मीर विवाद ने भी संबंधों को सामान्य होने नहीं दिया। समय समय पर शांति वार्ताएं हुईं, व्यापार बढ़ाने के प्रयास किए गए और सांस्कृतिक आदान प्रदान की पहल भी हुई, लेकिन हर बार कोई न कोई घटना संबंधों को पीछे धकेल देती रही। इस पृष्ठभूमि में किसी पाकिस्तानी वरिष्ठ नेता द्वारा यह स्वीकार करना कि अवसर गंवाया गया, अपने आप में महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पिछले कई वर्षों से गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। विदेशी मुद्रा भंडार में कमी, बढ़ता राजकोषीय घाटा, महंगाई, ऊर्जा संकट और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से बार बार सहायता लेने की मजबूरी ने उसकी आर्थिक स्थिति को कमजोर किया है। अनेक विशेषज्ञ लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि यदि दक्षिण एशिया में आर्थिक सहयोग बढ़े और भारत तथा पाकिस्तान के बीच व्यापार सामान्य हो, तो दोनों देशों को लाभ मिल सकता है। भारत विशाल बाजार है और पाकिस्तान की कई वस्तुओं के लिए निकटतम व्यापारिक साझेदार भी हो सकता है। इसी संदर्भ में राणा सनाउल्लाह का बयान आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत ने पिछले एक दशक में अपनी अर्थव्यवस्था, आधारभूत संरचना, डिजिटल भुगतान प्रणाली, विनिर्माण और वैश्विक कूटनीति में उल्लेखनीय विस्तार किया है। दूसरी ओर पाकिस्तान आर्थिक संकटों, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से जूझता रहा है। यदि दोनों देशों के बीच सामान्य व्यापारिक संबंध होते तो सीमा पार व्यापार, परिवहन, ऊर्जा सहयोग और निवेश के नए अवसर विकसित हो सकते थे। दक्षिण एशिया विश्व की सबसे कम आर्थिक रूप से एकीकृत क्षेत्रों में गिना जाता है। इसका एक बड़ा कारण भारत और पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण संबंध भी हैं।

राणा सनाउल्लाह ने यह भी संकेत दिया कि आज पाकिस्तान भारत से संवाद स्थापित करने के लिए विभिन्न माध्यमों का सहारा लेने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने स्वीकार किया कि दोनों देशों के बीच बैक चैनल संपर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि वर्तमान परिस्थितियों में विश्वास की कमी बहुत अधिक है और पहले की तुलना में संवाद स्थापित करना कहीं अधिक कठिन हो गया है।

भारत का दृष्टिकोण भी पिछले कुछ वर्षों में अधिक स्पष्ट और कठोर हुआ है। भारत लगातार यह कहता रहा है कि आतंकवाद और वार्ता एक साथ नहीं चल सकते। भारत का आधिकारिक रुख यह है कि जब तक सीमा पार आतंकवाद समाप्त नहीं होता, तब तक संबंधों का सामान्य होना कठिन है। इसी कारण व्यापार, सांस्कृतिक आदान प्रदान और उच्च स्तरीय राजनीतिक संवाद भी सीमित रहे हैं। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच कई तनावपूर्ण घटनाओं ने इस दूरी को और बढ़ाया है।

राणा सनाउल्लाह का बयान केवल भारत की प्रशंसा भर नहीं है बल्कि पाकिस्तान की घरेलू राजनीति पर भी टिप्पणी माना जा रहा है। पाकिस्तान में लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि राष्ट्रीय संसाधनों का बड़ा हिस्सा सुरक्षा और रक्षा आवश्यकताओं पर खर्च होता है जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य और औद्योगिक विकास अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाते। यदि क्षेत्रीय तनाव कम हो तो संसाधनों का बेहतर उपयोग विकास कार्यों में किया जा सकता है। इस दृष्टि से उनका बयान पाकिस्तान के भीतर चल रही व्यापक बहस को भी सामने लाता है।

दक्षिण एशिया विश्व की लगभग एक चौथाई आबादी का घर है, लेकिन आर्थिक सहयोग के मामले में यह क्षेत्र अपेक्षाकृत पीछे है। यदि भारत और पाकिस्तान के बीच सामान्य संबंध स्थापित हों तो क्षेत्रीय व्यापार, पर्यटन, ऊर्जा, जल प्रबंधन, परिवहन और शिक्षा के क्षेत्र में नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। दोनों देशों की सांस्कृतिक विरासत, भाषाई समानता और ऐतिहासिक संबंध भी सहयोग को मजबूत आधार दे सकते हैं। यही कारण है कि समय समय पर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने की आवश्यकता पर बल देती रही हैं।

हालांकि केवल राजनीतिक इच्छा पर्याप्त नहीं होती। दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली के लिए ठोस कदम आवश्यक हैं। सीमा पर शांति बनाए रखना, आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई, मानवीय मुद्दों का समाधान, मछुआरों और कैदियों की रिहाई, व्यापारिक प्रतिबंधों में चरणबद्ध ढील और सांस्कृतिक संपर्क बढ़ाना ऐसे उपाय हो सकते हैं जो धीरे धीरे विश्वास का वातावरण तैयार करें। लेकिन यह प्रक्रिया लंबी और जटिल होगी क्योंकि दोनों देशों के बीच कई दशकों का अविश्वास मौजूद है।

राणा सनाउल्लाह के बयान पर पाकिस्तान के भीतर भी अलग अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोगों ने इसे यथार्थवादी स्वीकारोक्ति बताया, जबकि कुछ ने इसे राजनीतिक बयानबाजी माना। भारत में भी इस बयान को सावधानी के साथ देखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सकारात्मक परिवर्तन का आकलन केवल बयानों से नहीं बल्कि व्यवहारिक कदमों से किया जाना चाहिए। जब तक दोनों देशों की नीतियों में ठोस बदलाव दिखाई नहीं देता, तब तक ऐसे वक्तव्यों को संभावनाओं के संकेत के रूप में ही देखा जाएगा।

इतिहास यह बताता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच कई बार सकारात्मक पहल हुई है। बस सेवा शुरू हुई, व्यापार बढ़ाने की कोशिश हुई, खेल प्रतियोगिताएं आयोजित हुईं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों के बीच संपर्क भी बढ़ा। लेकिन हर बार किसी बड़ी सुरक्षा घटना ने इन प्रयासों को झटका दिया। इसलिए भविष्य में यदि कोई नई शुरुआत होती है तो उसे अधिक मजबूत संस्थागत आधार और पारस्परिक विश्वास की आवश्यकता होगी।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि राणा सनाउल्लाह का बयान पाकिस्तान सरकार की किसी नई आधिकारिक नीति की घोषणा नहीं है। यह एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता का सार्वजनिक आकलन है, जिसे व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। फिर भी यह इस बात का संकेत अवश्य देता है कि पाकिस्तान के भीतर कुछ राजनीतिक वर्ग अब यह स्वीकार करने लगे हैं कि लगातार टकराव की नीति से अपेक्षित लाभ नहीं मिला और आर्थिक विकास के लिए पड़ोसी देशों के साथ सहयोग आवश्यक हो सकता है।

दक्षिण एशिया की स्थिरता केवल भारत और पाकिस्तान के लिए ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है। यदि दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है तो निवेश बढ़ सकता है, व्यापारिक मार्ग खुल सकते हैं, ऊर्जा सहयोग को गति मिल सकती है और करोड़ों लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी ओर यदि अविश्वास और संघर्ष की स्थिति बनी रहती है तो विकास की संभावनाएं सीमित ही रहेंगी।

राणा सनाउल्लाह का वक्तव्य इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह अतीत की नीतियों पर आत्मचिंतन का संकेत भी है और भविष्य की संभावनाओं की ओर इशारा भी। हालांकि वास्तविक परिवर्तन केवल शब्दों से नहीं बल्कि ठोस नीतिगत निर्णयों, विश्वास निर्माण के उपायों और निरंतर संवाद से ही संभव होगा। यदि दोनों देश अपने मतभेदों को नियंत्रित करते हुए साझा हितों पर आगे बढ़ने का रास्ता खोजते हैं, तो न केवल भारत और पाकिस्तान बल्कि पूरा दक्षिण एशिया अधिक शांत, समृद्ध और स्थिर भविष्य की ओर बढ़ सकता है।