अजय कुमार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 भले अभी दूर हों, लेकिन सियासी दलों ने अपने-अपने चुनावी नैरेटिव तैयार करने शुरू कर दिए हैं। भाजपा जहां अपनी सरकार के कामकाज और कल्याणकारी योजनाओं को लेकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के जरिए अपने सामाजिक गठजोड़ को और मजबूत करने में जुटी है। इसी बीच एनडीए के सहयोगी और योगी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने ऐसा मोर्चा खोल दिया है, जिसने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। पिछले कई दिनों से राजभर लगातार अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री कार्यकाल (2012-2017) की चर्चित घटनाओं को सोशल मीडिया के जरिए सामने ला रहे हैं। उनकी कोशिश सिर्फ पुराने मामलों को याद दिलाने की नहीं, बल्कि यह सवाल खड़ा करने की भी है कि अगर समाजवादी पार्टी दोबारा सत्ता में आती है तो क्या उत्तर प्रदेश फिर उसी दौर में लौट जाएगा। बुधवार को राजभर ने अपनी सोशल मीडिया श्रृंखला “सपा की जातीय हिंसा” का दूसरा भाग जारी किया। इसमें उन्होंने दावा किया कि मार्च 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के महज 36 घंटे के भीतर प्रदेश के कई जिलों में हिंसा, आगजनी और दलित-अति पिछड़े समाज के लोगों पर हमलों की घटनाएं हुईं। उन्होंने अंबेडकरनगर में तत्कालीन बसपा सरकार के एक पूर्व मंत्री की राइस मिल जलाए जाने का भी उल्लेख किया। इससे पहले वह सीतापुर में दलित बस्तियों में आगजनी, बुलंदशहर हाईवे गैंगरेप और बदायूं की चर्चित घटना को लेकर भी अखिलेश यादव पर सवाल उठा चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयानबाजी नहीं, बल्कि चुनाव से पहले कानून-व्यवस्था को फिर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश है।
दिलचस्प बात यह है कि राजभर ने यह अभियान ऐसे समय शुरू किया है, जब समाजवादी पार्टी लगातार पीडीए की राजनीति को आगे बढ़ा रही है। लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी ने पिछड़े, दलित और मुस्लिम वोटों के बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ने में सफलता हासिल की थी। पूर्वांचल के जिन इलाकों में कभी ओमप्रकाश राजभर अपनी मजबूत पकड़ का दावा करते थे, वहां भी समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा। आजमगढ़, घोसी, लालगंज, गाजीपुर, जौनपुर और आसपास के क्षेत्रों में मिले चुनावी संकेतों ने यह साफ कर दिया कि गैर-यादव पिछड़ों की राजनीति अब पहले जैसी एकतरफा नहीं रही। यही वजह है कि राजभर अब उसी सामाजिक आधार को दोबारा अपने पक्ष में करने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि राजभर के लगातार हमलों के पीछे सिर्फ वैचारिक टकराव नहीं, बल्कि राजनीतिक मजबूरियां भी हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उनके बेटे अरुण राजभर जीत दर्ज नहीं कर सके। जिन इलाकों को सुभासपा का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है, वहां भी भाजपा को अपेक्षित बढ़त नहीं मिली। इसके बाद एनडीए के भीतर भी सहयोगी दलों की ताकत को लेकर चर्चाएं शुरू हुईं। विधानसभा चुनाव से पहले सीट बंटवारे का सवाल भी धीरे-धीरे आकार ले रहा है। ऐसे में राजभर अपने राजनीतिक प्रभाव को लगातार प्रदर्शित करना चाहते हैं। अखिलेश यादव पर सीधे हमले करके वह भाजपा नेतृत्व को यह संदेश भी देना चाहते हैं कि पूर्वांचल की राजनीति में उनकी उपयोगिता अभी खत्म नहीं हुई है।
इसके साथ ही सुभासपा की आंतरिक राजनीति भी इस रणनीति की एक वजह मानी जा रही है। पिछले कुछ महीनों से पार्टी के कई विधायकों के समाजवादी पार्टी के संपर्क में होने की चर्चाएं होती रही हैं। अरुण राजभर भी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके हैं कि कुछ नेता समाजवादी पार्टी के करीब हैं। ऐसे में संगठन के भीतर संदेश देने के लिए भी ओमप्रकाश राजभर लगातार सपा पर हमलावर रुख अपनाए हुए हैं। राजनीतिक दलों में यह पुराना तरीका रहा है कि जब संगठन पर दबाव बढ़ता है तो नेतृत्व अपने कार्यकर्ताओं को एक साझा राजनीतिक विरोधी के खिलाफ लामबंद करने की कोशिश करता है। राजभर जिन मामलों को सबसे प्रमुखता से उठा रहे हैं, उनमें जुलाई 2016 का बुलंदशहर हाईवे गैंगरेप मामला शामिल है। नोएडा से शाहजहांपुर जा रहे परिवार की कार को नेशनल हाईवे-91 पर रोककर लूटपाट की गई और मां-बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद विशेष पॉक्सो अदालत ने पांच दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और प्रत्येक पर आर्थिक दंड भी लगाया। अदालत ने अपने फैसले में ऐसे अपराधों को समाज के लिए गंभीर खतरा बताया। राजभर अब इसी फैसले का हवाला देकर यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उस दौर की कानून-व्यवस्था को जनता भूली नहीं है।
इसी तरह 2014 का बदायूं मामला भी उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। दो किशोरियों के शव पेड़ से लटके मिलने के बाद शुरुआती दौर में सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के आरोप लगे थे। बाद में केंद्रीय जांच एजेंसी की वैज्ञानिक जांच और अदालत की प्रक्रिया में गैंगरेप और हत्या की पुष्टि नहीं हुई। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सीबीआई के निष्कर्षों को स्वीकार किया, हालांकि एक आरोपी के खिलाफ अपहरण और पॉक्सो एक्ट से जुड़े आरोपों पर मुकदमा जारी रखने का आदेश दिया गया। यह मामला आज भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बनता है, लेकिन इसके कानूनी निष्कर्षों और शुरुआती आरोपों के बीच अंतर को समझना भी उतना ही जरूरी है। राजभर लगातार सीतापुर की घटनाओं का भी उल्लेख कर रहे हैं। 2015 और 2016 में दलित बस्तियों में आगजनी की घटनाओं को उस समय विपक्ष ने कानून-व्यवस्था की विफलता बताया था। समाजवादी पार्टी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की गई। अब चुनावी माहौल बनने से पहले इन्हीं घटनाओं को फिर राजनीतिक विमर्श में लाया जा रहा है। इससे साफ है कि राजभर सिर्फ अपराध की घटनाएं नहीं गिना रहे, बल्कि दलित और गैर-यादव पिछड़े वर्ग के बीच एक विशेष राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि उत्तर प्रदेश की राजनीति का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। समाजवादी पार्टी का कहना है कि भाजपा और उसके सहयोगी पुराने मामलों को उछालकर वर्तमान मुद्दों से ध्यान भटकाना चाहते हैं। पार्टी लगातार बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, किसानों की आय, युवाओं के रोजगार और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों को जनता के बीच उठा रही है। अखिलेश यादव अपने भाषणों में सरकार से इन्हीं सवालों पर जवाब मांगते हैं। यानी एक तरफ सत्ता पक्ष और उसके सहयोगी अतीत का रिकॉर्ड सामने रख रहे हैं तो दूसरी तरफ विपक्ष वर्तमान सरकार के प्रदर्शन को चुनावी मुद्दा बनाना चाहता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल विकास या केवल जातीय समीकरणों पर नहीं लड़ा जाएगा। कानून-व्यवस्था, सामाजिक न्याय, पिछड़ा वर्ग की राजनीति, दलित वोटों का रुझान और युवाओं से जुड़े मुद्दे समानांतर रूप से चुनावी विमर्श का हिस्सा रहेंगे। ऐसे में ओमप्रकाश राजभर का यह अभियान सिर्फ अखिलेश यादव पर हमला नहीं, बल्कि गैर-यादव पिछड़ों और दलित मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश भी है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी पीडीए के जरिए इन्हीं वर्गों में अपनी पकड़ बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है। यही वजह है कि 2012 की फाइलें अचानक फिर चर्चा में हैं। आने वाले महीनों में यह सियासी टकराव और तेज होने की संभावना है। एक तरफ राजभर अतीत की घटनाओं को चुनावी मुद्दा बनाएंगे, तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी वर्तमान सरकार के कामकाज को कठघरे में खड़ा करेगी। साफ है कि 2027 की जंग सिर्फ दो नेताओं के बीच नहीं होगी, बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक नैरेटिव के बीच होगी एक अतीत के रिकॉर्ड के सहारे जनता का भरोसा जीतना चाहता है, तो दूसरा वर्तमान के सवालों के आधार पर सत्ता परिवर्तन की जमीन तैयार करने में जुटा है। यही संघर्ष आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा भी तय करेगा।





