अजय कुमार
लोकतंत्र में एक कुर्सी की कीमत क्या है? यह सवाल अक्सर धूल-धूसरित बहसों में खो जाता है, लेकिन ब्रिटेन की राजनीति ने आज एक ऐसा उदाहरण पेश किया है जो दुनिया भर के सत्ताधारियों को आईना दिखा रहा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का इस्तीफा महज एक राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह उस संसदीय संस्कृति की परिणति है जहाँ व्यक्ति से बड़ी उसकी पार्टी और पार्टी से बड़ा जनता का भरोसा होता है। जब स्टार्मर ने यह कहा कि उनकी पार्टी उनसे यह सवाल कर रही है कि क्या वे अगले चुनाव में नेतृत्व के लिए सबसे सक्षम हैं और वे इसे पूरी गरिमा के साथ स्वीकार करते हैं, तो उन्होंने सिर्फ पद नहीं छोड़ा, बल्कि यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र में सत्ता का हस्तांतरण केवल चुनाव की बैलेट पेटियों तक सीमित नहीं होता। गौर करने वाली बात यह है कि जुलाई 2024 में स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने 412 सीटों का जो प्रचंड बहुमत हासिल किया था, वह ऐतिहासिक था। उन्होंने कंजर्वेटिव पार्टी के 14 साल के वर्चस्व को ध्वस्त किया था। लेकिन महज दो साल के भीतर, जून 2026 में, वही कीर स्टार्मर अपनी ही पार्टी के करीब 100 सांसदों के दबाव के आगे झुकने को मजबूर हो गए। यह घटनाक्रम हमें उन तमाम पुराने और नए राजनीतिक समीकरणों को जोड़ने पर मजबूर करता है, जो ब्रिटेन और भारत की संसदीय प्रणाली के बीच की गहरी लकीरों को स्पष्ट करते हैं।
ब्रिटेन के इस घटनाक्रम को समझने के लिए हमें उस व्यवस्था की नब्ज देखनी होगी जो वहां पिछले एक दशक से लगातार करवट ले रही है। डेविड कैमरन से लेकर थेरेसा मे, बोरिस जॉनसन, लिज ट्रस और ऋषि सुनक तक, ब्रिटेन की राजनीति में पिछले दस वर्षों में छह प्रधानमंत्री ऐसे रहे जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया। यह स्थिरता की कमी नहीं, बल्कि जवाबदेही की एक बेहद कड़वी और अनिवार्य प्रक्रिया है। वहां का सिस्टम एक स्पष्ट संदेश देता है प्रधानमंत्री पद कोई स्थायी जागीर नहीं है। यदि आप महत्वपूर्ण विधायी बिल पास नहीं करा पा रहे हैं या आपकी अपनी ही पार्टी में आपके नेतृत्व को लेकर अविश्वास पैदा हो गया है, तो लोकप्रियता के शिखर पर होने के बावजूद आपका टिके रहना असंभव हो जाता है। कीर स्टार्मर के मामले में भी यही हुआ। चुनाव जीतने के बाद अर्थव्यवस्था का दबाव, एनएचएस की लचर स्थिति और अवैध प्रवासन जैसे मुद्दों ने उनकी छवि को धूमिल किया। जब एंडी बर्नहम की बाई-इलेक्शन में जीत ने पार्टी के भीतर नेतृत्व के लिए एक नया विकल्प पेश किया, तो सांसदों ने बिना किसी संकोच के स्टार्मर के सामने सवाल खड़े किए। ब्रिटेन में इसे गद्दारी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया माना जाता है। वहां वोटर पार्टी को नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के सांसद को वोट देते हैं, इसलिए सांसद अपनी अंतरात्मा और अपने क्षेत्र की जनता के प्रति जवाबदेह होता है। वहां का कोई दल-बदल कानून ऐसा नहीं है जो सांसद को अपनी बात कहने से रोक सके। व्हिप का उल्लंघन हो सकता है, लेकिन पार्टी छोड़ने पर सदस्यता खत्म होने का डर वहां की संस्कृति में नहीं है।
अब जरा इस परिदृश्य को भारत की संसदीय व्यवस्था के चश्मे से देखिए, जहाँ तस्वीर पूरी तरह उलट है। भारत में 1985 का दल-बदल कानून (10वीं अनुसूची) आज एक ऐसी दीवार बन चुका है जिसने पार्टी हाई-कमांड को बेलगाम शक्तियां दे दी हैं। इस कानून का उद्देश्य तो दल-बदल की अराजकता को रोकना था, लेकिन व्यवहार में इसने असहमति की हर आवाज को ‘बागी’ या ‘गद्दार’ का तमगा दे दिया है। भारत में यदि कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी की लाइन से जरा भी असहमत होता है, तो उसे निष्कासन का सामना करना पड़ता है। नतीजा यह होता है कि पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक बहस खत्म हो जाती है और असंतोष एक अंदरूनी विस्फोट का रूप ले लेता है, जैसा हमने शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस के मामलों में देखा। शिवसेना में 2022 में जो हुआ, वह एक स्वस्थ संवाद की कमी का ही परिणाम था। यदि पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन के लिए ब्रिटेन जैसा खुला मंच होता, तो शायद पूरी पार्टी का विभाजन नहीं होता। इसी तरह पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर बढ़ता असंतोष भी यह बताता है कि जब सत्ता का केंद्र एक परिवार या एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमट जाता है, तो वहां सवाल पूछने वालों के लिए कोई जगह नहीं बचती। भारत में पार्टियां अक्सर प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह काम करती हैं, जहां असहमति का मतलब ही ‘बाहर का रास्ता’ होता है।
ब्रिटेन में नेतृत्व का चयन सांसदों और पार्टी सदस्यों के वोट के जरिए होता है, जहाँ विश्वास मत के जरिए विवादों को सुलझाया जाता है। नेता को आलोचना का सामना करना पड़ता है, लेकिन उसे कभी विद्रोही नहीं कहा जाता। वहीं, भारत में कई क्षेत्रीय दल परिवार-केंद्रित हैं। वहां नेता ही संस्था है। ब्रिटेन में नेता बदल जाता है ताकि पार्टी बची रहे, जबकि भारत में कई बार पार्टी टूट जाती है ताकि नेता की कुर्सी बची रहे। यह विरोधाभास आज की राजनीति का सबसे कड़वा सच है। कीर स्टार्मर का इस्तीफा हमें सिखाता है कि जब कोई नेता जनता की अपेक्षाओं और पार्टी के विश्वास पर खरा नहीं उतरता, तो उसे हट जाना चाहिए। स्टार्मर ने 412 सांसदों के बहुमत के बाद भी इस्तीफा दिया क्योंकि वे जानते थे कि कुर्सी से चिपके रहने की कीमत अंततः पार्टी और देश को चुकानी पड़ेगी।
जब हम इन तमाम कड़ियों को जोड़ते हैं, तो पाते हैं कि ब्रिटेन का मॉडल भले ही अस्थिरता का संकेत देता हो, लेकिन वह जवाबदेही की एक ऐसी मिसाल है जो लोकतंत्र की असली आत्मा को जीवित रखती है। इसके विपरीत भारत की व्यवस्था स्थिरता तो देती है, लेकिन वह आंतरिक लोकतंत्र को खोखला कर रही है। भारत में आज जरूरत इस बात की है कि पार्टियों के भीतर भी एक ऐसा वातावरण तैयार किया जाए जहाँ ‘सक्षम नेतृत्व’ के सवाल को विद्रोह नहीं, बल्कि आत्म-मंथन माना जाए। राजनीति में जवाबदेही और बहस की खुली संस्कृति ही वह एकमात्र रास्ता है जिससे कोई भी लोकतंत्र अपनी जड़ें गहरी कर सकता है। स्टार्मर का यह इस्तीफा आधुनिक संसदीय इतिहास में एक ऐसे मोड़ की तरह याद रखा जाएगा, जहां एक नेता ने सत्ता के गलियारों से बाहर निकलकर यह स्वीकार किया कि लोकतंत्र कुर्सी पर नहीं, बल्कि लोगों के भरोसे पर टिका होता है। आने वाले समय में भारत के राजनीतिक दलों को यह तय करना होगा कि क्या वे ‘पार्टी-प्रधान’ व्यवस्था में खुद को सीमित रखेंगे या फिर ‘लोकतंत्र-प्रधान’ बनकर अपने भीतर के असंतोष को एक नई ऊर्जा में बदलेंगे। अंततः, चुनाव जीतना ही आखिरी मंजिल नहीं है, बल्कि उस जीत के बाद हर पल साबित करना कि आप सेवा करने के लिए सबसे सक्षम हैं, यही असली नेतृत्व है। जिस दिन यह अहसास हमारे राजनीतिक गलियारों में घर कर लेगा, उस दिन शायद ‘बागी’ और ‘गद्दार’ जैसे शब्दों की जगह ‘संवाद’ और ‘सुधार’ ले लेंगे।





