रविवार दिल्ली नेटवर्क
तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ पैरामेडिकल साइंसेज के ऑप्टोमेट्री थर्ड ईयर के स्टुडेंट्स ने कार्ल ज़ाइस लेंस लैब, दिल्ली का औद्योगिक भ्रमण किया। कॉलेज ऑफ पैरामेडिकल के प्रिंसिपल प्रो. नवनीत कुमार ने बताया, इस औद्योगिक भ्रमण से स्टुडेंट्स को न केवल लेंस निर्माण की तकनीकी प्रक्रियाओं की बारीकियां समझीं। लैब के एक्सपर्ट श्री विख्यात सिंह ने स्टुडेंट्स को बताया, प्रत्येक लेंस के निर्माण में क्वालिटी कंट्रोल अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। हर चरण पर लेंस की जांच की जाती है ताकि पॉवर, मोटाई, पारदर्शिता और फिनिशिंग में कोई त्रुटि न रहे। आधुनिक लैब में स्वचालित मशीनों और कंप्यूटर आधारित तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जिससे सटीकता और गुणवत्ता सुनिश्चित होती है। एक्सपर्ट ने प्रत्येक चरण की तकनीकी बारीकियों को सरल भाषा में समझाते हुए छात्रों के प्रश्नों का उत्तर दिया। विजिट में फैकल्टीज़- श्री शिवम पांडेय और सुश्री विवेचना के संग-संग 45 छात्र-छात्राएं शामिल रहे।
ऐसे होता है लेंस निर्माण
लेंस निर्माण की शुरुआत कच्चे ब्लैंक से होती है, जिसे विशेष मशीनों की सहायता से आवश्यक पॉवर के अनुसार तैयार किया जाता है। सर्फेसिंग प्रक्रिया में लेंस की सतह को आकार दिया जाता है। इसके बाद ग्राइंडिंग करके अधिक सटीक रूप दिया जाता है। पॉलिशिंग से लेंस की सतह को चिकना और पारदर्शी बनाया जाता है, ताकि दृष्टि स्पष्ट हो सके। लेंस पर एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग, हार्ड कोटिंग और यूवी प्रोटेक्शन कोटिंग की जाती हैं, जो लेंस की गुणवत्ता और उपयोगिता को बढ़ाती हैं। अंत में एजिंग प्रक्रिया में लेंस को फ्रेम के आकार के अनुसार काटा और फिट किया जाता है। सिंगल विज़न लेंस एक ही पावर के होते हैं और सामान्य दृष्टि दोष जैसे मायोपिया या हाइपरोपिया के लिए उपयोग किए जाते हैं। बाइफोकल लेंस में दो अलग-अलग पावर होती हैं, जिससे व्यक्ति दूर और पास दोनों दूरी पर स्पष्ट देख सकता है। प्रोग्रेसिव लेंस आधुनिक लेंस होते हैं, जिनमें बिना किसी स्पष्ट रेखा के दूर, मध्य और पास की दृष्टि के लिए अलग-अलग पॉवर क्रमिक रूप से मिलती है, जिससे दृष्टि अधिक प्राकृतिक महसूस होती है।





