“रिजेक्टेड खेपों का सच क्या है: भारतीय आम पर जापान का गुणवत्ता प्रतिबंध तथा भारतीय चावल पर चीन की घटिया चालबाजी ?”
डॉ. राजाराम त्रिपाठी
● जापान का प्रतिबंध गुणवत्ता आधारित चेतावनी है, जबकि चीन का झूठा आरोप व्यापारिक दादागिरी प्रतीत होता है।
● भारत में जीएम धान की व्यावसायिक खेती नहीं होने के बावजूद चीन द्वारा इस आधार पर भारतीय चावल लौटाना गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
● सच तो यही है कि,केवल कागजी “ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन” से अंतरराष्ट्रीय बाजार नहीं जीते जा सकते।
● किसानों, सरकार और प्रमाणन एजेंसियों को मिलकर कृषि उत्पादों की वास्तविक गुणवत्ता सुधार की दिशा में गंभीरता से काम करना होगा।
● अंतरराष्ट्रीय व्यापार युद्धों को भली-भांति समझे बिना देश की किसान राजनीति अधूरी और अप्रभावी रहेगी।
भारत आज विश्व का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है। विश्व के कुल आम उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत मानी जाती है। इसी प्रकार भारत वर्ष 2024-25 में लगभग 220 लाख टन से अधिक चावल निर्यात कर विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश बन चुका है। भारतीय कृषि उत्पाद आज 150 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं। किंतु विडंबना यह है कि जिस कृषि शक्ति पर देश गर्व करता है, वही शक्ति आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में गुणवत्ता, प्रमाणन और व्यापारिक राजनीति के बीच घिरती जा रही है।
हाल ही में जापान द्वारा भारतीय आमों पर लगाए गए प्रतिबंध और चीन द्वारा भारतीय गैर-बासमती चावल की लगभग 70 खेपों को लौटाने की घटनाएं केवल व्यापारिक समाचार नहीं हैं, बल्कि वे भारत की कृषि निर्यात नीति, गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली और वैश्विक व्यापारिक चुनौतियों की पोल खोलने वाली घटनाएं हैं।
इन दोनों मामलों को एक ही दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। जापान और चीन के एंगल बिल्कुल अलग हैं। जापान का दृष्टिकोण गुणवत्ता और जैव सुरक्षा का है, जबकि चीन का रवैया स्पष्ट रूप से व्यापारिक दबाव और रणनीतिक दादागिरी का प्रतीत होता है।
जापान ने भारतीय आमों पर यह कहते हुए रोक लगाई कि उनमें कीट नियंत्रण और गुणवत्ता संबंधी मानकों का पालन पर्याप्त रूप से नहीं हुआ। जापान विश्व के सबसे कठोर गुणवत्ता मानकों वाले देशों में गिना जाता है। वहां कृषि उत्पादों के लिए फाइटोसैनिटरी नियम अत्यंत सख्त हैं। पिछले कुछेक दशकों में कृषि उत्पादों तथा खाद्य पदार्थों के गुणवत्ता मानकों को लेकर जापान में अमेरिकी मानकों को हर स्तर पर पीछे छोड़ने का जुनून सवार रहा है। यदि भारतीय आमों में कीट या गुणवत्ता संबंधी कमियां पाई गईं, तो यह भारत के लिए चेतावनी है कि हमें केवल उत्पादन बढ़ाने से संतुष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि वैश्विक गुणवत्ता मानकों को भी गंभीरता से अपनाना होगा।
यह भी याद रखना होगा कि वर्ष 2014 में यूरोपीय संघ ने भी भारतीय आमों पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया था। कारण था फल मक्खी और क्वारंटाइन संबंधी खामियां। उस समय भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी किरकिरी हुई थी। बाद में सुधारात्मक कदमों के बाद यह प्रतिबंध हट सका। लेकिन इस घटना ने साबित कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार “भावनाओं” से नहीं, बल्कि “विश्वसनीय गुणवत्ता” से चलता है।
कड़वी सच्चाई यह है कि भारत में जैविक और निर्यातोन्मुख खेती के नाम पर भारी भ्रम फैला दिया गया है। कोई “वैदिक खेती” बेच रहा है, कोई “सनातन खेती”, कोई “अहिंसक खेती”, कोई “जहर मुक्त खेती”, कोई “कार्बनिक खेती”, कोई “शून्य बजट खेती”, कोई “प्राकृतिक खेती”, कोई “गौ आधारित खेती”, कोई “पंचगव्य खेती”, कोई “ऋषि खेती”, कोई “देसी खेती”, कोई “आध्यात्मिक खेती”, कोई “काऊ पैथी खेती”, तो कोई “बायो डायनामिक खेती” के नए-नए मॉडल प्रस्तुत कर रहा है। स्थिति यह हो गई है कि किसान वैज्ञानिक और अंतरराष्ट्रीय मानकों से अधिक बाबाओं, प्रवचनों और प्रचार आधारित खेती के जाल में फंसता जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार भावनाओं से नहीं, प्रमाणित गुणवत्ता से चलता है।
विश्व व्यापार में नारे नहीं, नमूने जांचे जाते हैं।
विदेशी बाजार में भावुकता नहीं, केवल गुणवत्ता की भाषा बोली जाती है।
मैं यह बात केवल सिद्धांत के आधार पर नहीं कह रहा हूं। हमारा “मां दंतेश्वरी हर्बल समूह” देश का पहला प्रमाणित ऑर्गेनिक हर्बल समूह रहा है, जिसने लगभग 25 वर्ष पहले औषधीय एवं सुगंधीय पौधों के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय ऑर्गेनिक प्रमाणन प्राप्त किया था। हमें सर्वश्रेष्ठ निर्यातक पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। हमारा अनुभव स्पष्ट कहता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में विश्वास बनाने में वर्षों लगते हैं, लेकिन एक खराब खेप पूरे देश की साख को नुकसान पहुंचा देती है।
यही कारण है कि बार-बार भारतीय जैविक उत्पादों में केमिकल रेसिड्यू मिलने, शिपमेंट रिजेक्ट होने और माल वापस लौटाए जाने की घटनाएं अत्यंत चिंताजनक हैं। वर्ष 2022 और 2023 के दौरान यूरोप और अमेरिका ने भारतीय मसालों, तिलहन उत्पादों, चाय तथा कुछ ऑर्गेनिक उत्पादों की कई खेपों में अवशेष स्तर अधिक पाए जाने पर चेतावनी जारी की थी। दुखद यह है कि कई तथाकथित प्रमाणन एजेंसियां केवल “सर्टिफिकेट बेचने” का कारोबार बनकर रह गई हैं। वास्तविक खेत निरीक्षण, गुणवत्ता परीक्षण और किसान प्रशिक्षण लगभग गायब हैं। कागजों में ऑर्गेनिक खेती हो रही है, लेकिन खेतों में रासायनिक जहर खुलकर उपयोग हो रहा है।
भारत को यदि वैश्विक कृषि व्यापार में सम्मानजनक स्थान बनाए रखना है, तो उसे केवल “ऑर्गेनिक” शब्द के प्रचार से आगे बढ़ना होगा। किसानों को NPOP (नेशनल प्रोग्राम फॉर ऑर्गेनिक प्रोडक्शन), GAP, HACCP, Codex तथा अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों की वास्तविक जानकारी देनी होगी। उन्हें यह समझाना होगा कि निर्यात केवल उत्पादन नहीं, बल्कि अनुशासित गुणवत्ता प्रणाली का परिणाम होता है।
लेकिन चीन का मामला अलग और अधिक गंभीर है।
चीन ने भारतीय गैर-बासमती चावल की लगभग 70 खेप यह कहते हुए लौटा दीं कि उनमें “जेनेटिकली मॉडिफाइड” तत्व पाए गए हैं। यह आरोप अत्यंत संदिग्ध है, क्योंकि भारत में आज भी जीएम धान की व्यावसायिक खेती को अनुमति प्राप्त नहीं है। जब देश में ऐसी खेती होती ही नहीं, तो इतने बड़े स्तर पर जीएम चावल मिलने का दावा कई सवाल खड़े करता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि चीन की जो प्रमाणन और निरीक्षण एजेंसियां भारत में सक्रिय हैं, जो निर्यात से पहले सर्टिफिकेट जारी करती हैं, उनकी उपयोगिता क्या है? यदि वही एजेंसियां पहले क्लीन चिट देती हैं और बाद में चीन उसी खेप को अस्वीकार कर देता है, तो यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि व्यापारिक अविश्वास और रणनीतिक दबाव की ओर संकेत करता है।
यहां भारत सरकार को भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कठोरता से प्रश्न उठाना चाहिए कि जब भारत में जीएम धान की अनुमति ही नहीं है, तब इस प्रकार के आरोपों का वैज्ञानिक आधार क्या है? यदि चीन के पास कोई ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाए। अन्यथा यह केवल एक “टेक्निकल ट्रेड बैरियर” है, जिसका उद्देश्य भारतीय निर्यातकों पर दबाव बनाना है।
सच यह है कि वैश्विक व्यापार आज केवल गुणवत्ता का खेल नहीं रह गया है। यह आर्थिक शक्ति, राजनीतिक दबाव और बाजार नियंत्रण का युद्ध बन चुका है। चीन लंबे समय से विभिन्न देशों पर तकनीकी प्रतिबंधों और गुणवत्ता संबंधी बहानों के माध्यम से दबाव बनाता रहा है। भारतीय कृषि उत्पादों पर इस प्रकार के आरोपों को भी उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
आज का व्यापार युद्ध अब सीमाओं पर नहीं, प्रयोगशालाओं और प्रमाणपत्रों के भीतर लड़ा जा रहा है।
अब बंदूकेंऔर तोपों के बजाय , “रिजेक्टेड शिपमेंट” अर्थव्यवस्थाओं को घायल कर रहे हैं।
भारत के किसान संगठनों को भी यह समझना होगा कि केवल स्थानीय आंदोलन और सड़क राजनीति पर्याप्त नहीं हैं।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति, आयात-निर्यात नियम, गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली और वैश्विक बाजार की राजनीति को समझे बिना किसान हितों की रक्षा संभव नहीं है। जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की कृषि साख पर हमला होता है, तब किसान संगठनों की चुप्पी चिंता पैदा करती है।
अमेरिका, फ्रांस, जापान और यूरोप के किसान संगठन अपने कृषि उत्पादों के हित में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जबरदस्त लॉबिंग करते हैं। वे अपने देशों की सरकारों पर दबाव बनाते हैं कि आयात नीति, सब्सिडी नीति और गुणवत्ता नीति किसानों के हित में बने। लेकिन भारत में अधिकांश किसान आंदोलन अभी भी केवल स्थानीय बिजली बिल, समर्थन मूल्य या क्षेत्रीय मुद्दों तक सीमित रह जाते हैं। यह स्थिति बदलनी होगी।
हमारे सभी सक्रिय किसान संगठनों एवं तथाकथित बड़े किसान नेताओं को भी अब केवल नारेबाजी से आगे बढ़ना होगा। उन्हें WTO, SPS मानकों, निर्यात नीतियों, Codex Alimentarius और वैश्विक गुणवत्ता नियमों की समझ विकसित करनी होगी। सरकार पर दबाव बनाना होगा कि कृषि निर्यात नीति किसान हित में बने और गुणवत्ता सुधार की वास्तविक व्यवस्था तैयार हो। और जब भी भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में घेरने यह अनावर्षिक रूप से नीचा दिखाने की कोशिश हो वहां अपने तमाम अंतर्विरोधों को भुलाकर अपनी सरकार के साथ मजबूती के साथ किसान संगठनों को और नेताओं को खड़ा होना चाहिए। यह भी देश के किसान संगठनों का राष्ट्र के प्रति जरूरी दायित्व है।
सरकार की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। केवल फाइलों और कागजों में निरीक्षण करके भारत कृषि महाशक्ति नहीं बन सकता। प्रमाणन एजेंसियों की जवाबदेही तय करनी होगी। नकली और केवल शुल्क वसूलने वाली एजेंसियों पर कठोर कार्रवाई करनी होगी। किसानों को प्रशिक्षण, ट्रेसबिलिटी सिस्टम, अवशेष परीक्षण और वास्तविक जैविक पद्धतियों से जोड़ना होगा।
भारत को यह भी समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में “एक बार की बदनामी” कई वर्षों तक पीछा नहीं छोड़ती। यूरोप, जापान और अमेरिका जैसे बाजार अत्यंत संवेदनशील हैं। यदि भारतीय उत्पादों की छवि कमजोर हुई, तो इसका नुकसान करोड़ों किसानों को भुगतना पड़ेगा।
आज आवश्यकता केवल विरोध की नहीं, बल्कि आत्ममंथन और रणनीतिक प्रतिरोध की है। जापान की चेतावनी को गुणवत्ता सुधार के अवसर के रूप में लेना होगा और चीन की व्यापारिक दादागिरी का अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कड़ा प्रतिवाद करना होगा। भारत को अपनी कृषि साख बचाने के लिए खेत से लेकर निर्यात बंदरगाह तक पूरी व्यवस्था को मजबूत करना पड़ेगा।
यदि भारत वास्तव में कृषि महाशक्ति बनना चाहता है, तो उसे भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि गुणवत्ता, वैज्ञानिक अनुशासन और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समझ से आगे बढ़ना होगा। तभी भारतीय किसान का पसीना विश्व बाजार में सम्मान और विश्वास दोनों अर्जित कर सकेगा।





