वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान–2026 : राजस्थान में जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने की पहल

Vande Ganga Jal Sanrakshan Jan Abhiyan-2026: An initiative to make water conservation a mass movement in Rajasthan

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

रेगिस्तान की धरती राजस्थान सदियों से पानी की हर बूंद का महत्व समझती रही है। यहां के लोगों ने कठिन जल परिस्थितियों में भी तालाब, बावड़ी, जोहड़ और कुंड जैसी पारंपरिक जल संरचनाओं के माध्यम से सदियों से प्रदेश के जीवन को संजोए रखा। बदलते समय, बढ़ती आबादी, भूजल दोहन और जलवायु परिवर्तन ने अब जल संकट को और गंभीर बना दिया है। ऐसे समय में राजस्थान सरकार द्वारा शुरू किया गया “वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान–2026” केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जल बचाने का सामाजिक संकल्प बनकर उभर रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जल संरक्षण को देश के भविष्य से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण विषय बताते हुए अनेक अवसरों पर कहा है कि “जल है तो कल है।” राजस्थान के “वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान” को भी प्रधानमंत्री की उसी सोच का विस्तार माना जा रहा है, जिसमें जनभागीदारी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया गया है।

मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के नेतृत्व में प्रारंभ यह अभियान 25 मई से 5 जून तक पूरे प्रदेश में चलाया जा रहा है। गंगा दशमी से विश्व पर्यावरण दिवस तक आयोजित इस अभियान का उद्देश्य जल संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ना और लोगों में पानी बचाने की स्थायी चेतना विकसित करना है। राजस्थान जैसे जल संकट वाले प्रदेश में यह अभियान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजस्थान का अधिकांश भूभाग शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्र में आता है। यहां वर्षा का औसत राष्ट्रीय स्तर की तुलना में काफी कम है। कई जिलों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। गर्मियों में पेयजल संकट और जल स्रोतों के सूखने की स्थिति आम होती जा रही है। ऐसे में जल संरक्षण अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि जीवन और विकास से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।

मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने वन्दे गंगा जल संरक्षण जन अभियान के शुभारंभ दिवस पर राज्य के टोंक जिले के बीसलपुर बांध पहुंचकर अभियान की शुरुआत की। उन्होंने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ जल पूजन किया और प्रदेशवासियों को जल संरक्षण का संदेश दिया। मुख्यमंत्री ने लोगों से पानी बचाने को जन आंदोलन बनाने की अपील करते हुए कहा कि राजस्थान में हर बूंद अमूल्य है। वहीं राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने भी इस अभियान के तहत जयपुर में विधानसभा परिसर में कल्प वृक्ष का पौधा लगाया और घोषणा की कि गंगा दशमी से विश्व पर्यावरण दिवस 05 जून तक प्रतिदिन विधानसभा में दो वृक्ष लगाये जायेंगे।

राजस्थान की पारंपरिक जल संस्कृति इस अभियान की सबसे बड़ी प्रेरणा है। यहां के पूर्वजों ने सीमित संसाधनों में भी जल संरक्षण के अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किए। जैसलमेर के कुंड, उदयपुर के तालाब, जयपुर की बावड़ियां और शेखावाटी के जोहड़ आज भी जल प्रबंधन की ऐतिहासिक विरासत हैं। “वंदे गंगा” अभियान इन्हीं परंपराओं को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित करने का प्रयास है। जल संरक्षण का यह अभियान राजस्थान के लिए बहुत अहम है। प्रदेश में सतही और भूमिगत जल की कमी और पानी की गुणवत्ता की खराब स्थिति से हर कोई वाकिफ है। कई जिलों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। गर्मियों में पेयजल संकट और जल स्रोतों के सूखने की स्थिति आम होती जा रही है। ऐसे में जल संरक्षण अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि जीवन और विकास से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान की विशेषता यह है कि इसमें सरकार के साथ समाज को भी सहभागी बनाया गया है। अभियान के अंतर्गत गांवों और शहरों में तालाबों, कुओं और बावड़ियों की सफाई, वर्षा जल संचयन संरचनाओं का निर्माण, पौधारोपण, श्रमदान और जल जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। स्कूलों, पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों और आम नागरिकों को इसमें जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य है कि जल संरक्षण केवल योजनाओं तक सीमित न रहे, बल्कि लोगों की जीवनशैली का हिस्सा बने।

राजस्थान की पारंपरिक जल संस्कृति इस अभियान की सबसे बड़ी प्रेरणा है। यहां के पूर्वजों ने सीमित संसाधनों में भी जल संरक्षण के अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किए। जैसलमेर बाड़मेर बीकानेर के कुंड, उदयपुर अंचल के तालाब, जयपुर अंचल की बावड़ियां और शेखावाटी क्षेत्र के जोहड़ आज भी जल प्रबंधन की ऐतिहासिक विरासत हैं। वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान इन्हीं परंपराओं को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित करने का प्रयास है।यह अभियान पर्यावरण संरक्षण से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। जल और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि जल स्रोत सुरक्षित रहेंगे तो हरियाली बढ़ेगी, भूजल स्तर सुधरेगा और जलवायु संतुलन को भी मजबूती मिलेगी। यही कारण है कि अभियान के अंतर्गत पौधारोपण और जल स्रोतों के संरक्षण को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी यह अभियान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य सरकार इसे केवल सरकारी कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत कर रही है। जिला प्रशासन, पंचायत राज संस्थाएं और नगरीय निकायों को विशेष जिम्मेदारी दी गई है कि वे स्थानीय स्तर पर लोगों को अभियान से जोड़ें। कई स्थानों पर जनप्रतिनिधि स्वयं श्रमदान कर लोगों को प्रेरित कर रहे हैं।

जल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार के अभियान निरंतर और गंभीरता से चलाए जाएं तो राजस्थान में जल संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। केवल बड़े बांधों और योजनाओं से समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए समाज की सोच और व्यवहार में परिवर्तन आवश्यक है। घरों में पानी की बचत, वर्षा जल संचयन और पारंपरिक जल स्रोतों की रक्षा जैसे छोटे प्रयास भी बड़े परिणाम दे सकते हैं।आज आवश्यकता इस बात की है कि जल संरक्षण को केवल सरकारी जिम्मेदारी न मानकर सामाजिक कर्तव्य समझा जाए। वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान इसी संदेश को मजबूत करता है कि पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यदि वर्तमान पीढ़ी ने जल संरक्षण के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई तो आने वाले समय में जल संकट और अधिक भयावह हो सकता है।

हालाँकि पश्चिमी राजस्थान में इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना ने थार मरुस्थल को हराभरा करने के साथ ही पेयजल और सिंचाई क्षेत्र में एक नई क्रान्ति लाई है। प्रदेश के चम्बल और माही तथा बीसलपुर आदि बाँधो ने भी ऐसा ही कर दिखाया है। इसी तर्ज पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की पहल से पूर्वी राजस्थान की प्यास बुझाने शुरू की जा रही राम जल सेतु लिंक प्रोजेक्ट का उल्लेख करना उचित होगा। इस महत्वाकांक्षी और दूरदर्शी परियोजना को राज्य के जल संकट के स्थायी समाधान की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इस योजना को नया स्वरूप देते हुए “रामजल सेतु लिंक प्रोजेक्ट” नाम दिया गया है। यह नाम केवल परियोजना की पहचान नहीं, बल्कि जल को जीवन और विकास के सेतु के रूप में देखने की सोच को भी दर्शाता है। इसमें विभिन्न नदियों को आपस में जोड़कर जल संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। जल संरक्षण, जल संचय और जल के न्यायसंगत वितरण की सोच पर आधारित यह परियोजना राज्य के विकास को नई दिशा देने की क्षमता रखती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि रामजल सेतु लिंक प्रोजेक्ट राजस्थान के जल इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय साबित हो सकता है। इसी प्रकार यमुना जल को प्रदेश के शेखावाटी अंचल में लाने के प्रयास की भी सराहना की जानी चाहिए।

डूंगरपुर का जल संरक्षण और जल संचय मॉडल

डूंगरपुर नगर परिषद के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में राज्य के स्वच्छता के ब्रॉड एम्बेसडर के के गुप्ता के डूंगरपुर नगर परिषद के वर्ष 2015 से 2020 तक के कार्यकाल के दौरान जल संरक्षण और जल संचय में अभूतपूर्व कार्य किए गए। सर्वप्रथम शहर ही पुरानी बावे एवं कुओं की सफाई करवाकर गहरे कर उनसे प्रतिदिन 8 लाख लीटर पानी नियमित रूप से जलदाय विभाग को देने का कार्य किया। क्षेत्र में शहर की झील, तालाबों को गहरा एवं साफ करवाया जिससे वर्षा का पानी लम्बे समय एवं प्रचूर मात्रा में एकत्रित करने में सहायक सिद्ध हुआ। शहर के 100 सरकारी बिल्डिंगों और 500 घरों को वाटर हार्वेस्टिंग से जोडने का कार्य तीव्र गति से किया जिसमें छतों का वर्षा का पानी वाटर हार्वेस्टिंग के द्वारा बोरिंग से सीधा धरती में उतारा तथा एक साल में ही धरती के पानी का स्तर 20 फीट बढ़ गया एवं जो पानी का टीडीएस पहले 840 तक था वह घटकर 570 पर आ गया। शहर के नकारा 100 हैण्डपम्पों को वाटर हार्वेस्टिंग से जोडा गया जो आज भरपूर पानी दे रहे है। तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री जल शक्ति मंत्री श्री गजेन्द्रसिंह शेखावत द्वारा केबिनेट मिटिंग में दिल्ली सरकार के मुख्य मंत्री को डूंगरपुर जाकर जल समस्या हेतु किए उपायों को दिल्ली में लागू करने हेतु निर्देशित किया गया। तत्पश्चात् दिल्ली से मंत्री और उनकी पूरी टीम डूंगरपुर आयी तथा डूंगरपुर की तर्ज पर वाटर हार्वेस्टिंग का कार्य दिल्ली में करवाने का निर्णय लिया गया। साथ ही दिल्ली में हर घर में वाटर हार्वेस्टिंग डूंगरपुर की तर्ज पर करने 50 हजार रूपये प्रति घर सब्सिडी एवं पानी के बिल में 10 प्रतिशत कटौती की घोषणा भी की गई।

“वंदे गंगा” अभियान की विशेषता यह है कि इसमें सरकार के साथ समाज को भी सहभागी बनाया गया है। अभियान के अंतर्गत गांवों और शहरों में तालाबों, कुओं और बावड़ियों की सफाई, वर्षा जल संचयन संरचनाओं का निर्माण, पौधारोपण, श्रमदान और जल जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। स्कूलों, पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों और आम नागरिकों को इसमें जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य है कि जल संरक्षण केवल योजनाओं तक सीमित न रहे, बल्कि लोगों की जीवनशैली का हिस्सा बने।यह अभियान पर्यावरण संरक्षण से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। जल और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि जल स्रोत सुरक्षित रहेंगे तो हरियाली बढ़ेगी, भूजल स्तर सुधरेगा और जलवायु संतुलन को भी मजबूती मिलेगी। यही कारण है कि अभियान के अंतर्गत पौधारोपण और जल स्रोतों के संरक्षण को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी यह अभियान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य सरकार इसे केवल सरकारी कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत कर रही है। जिला प्रशासन, पंचायत राज संस्थाएं और नगरीय निकायों को विशेष जिम्मेदारी दी गई है कि वे स्थानीय स्तर पर लोगों को अभियान से जोड़ें। कई स्थानों पर जनप्रतिनिधि स्वयं श्रमदान कर लोगों को प्रेरित कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार के अभियान निरंतर और गंभीरता से चलाए जाएं तो राजस्थान में जल संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। केवल बड़े बांधों और योजनाओं से समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए समाज की सोच और व्यवहार में परिवर्तन आवश्यक है। घरों में पानी की बचत, वर्षा जल संचयन और पारंपरिक जल स्रोतों की रक्षा जैसे छोटे प्रयास भी बड़े परिणाम दे सकते हैं।आज आवश्यकता इस बात की है कि जल संरक्षण को केवल सरकारी जिम्मेदारी न मानकर सामाजिक कर्तव्य समझा जाए। “वंदे गंगा” अभियान इसी संदेश को मजबूत करता है कि पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यदि वर्तमान पीढ़ी ने जल संरक्षण के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई तो आने वाले समय में जल संकट और अधिक भयावह हो सकता है। रेगिस्तान की यह धरती सदियों से पानी की कीमत पहचानती रही है। अब “वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान उस चेतना को नए युग में जन आंदोलन का स्वरूप देने का प्रयास है। यदि सरकार और समाज मिलकर इस दिशा में निरंतर कार्य करें, तो राजस्थान जल संरक्षण का राष्ट्रीय मॉडल बन सकता है। उस चेतना को नए युग में जन आंदोलन का स्वरूप देने का प्रयास है। यदि सरकार और समाज मिलकर इस दिशा में निरंतर कार्य करें, तो राजस्थान जल संरक्षण का राष्ट्रीय मॉडल बन सकता है।