दिलीप कुमार पाठक
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 10 मई की तारीख महज एक घटना नहीं, बल्कि एक हमारी चेतना के उदय का प्रतीक है। संयोग देखिए कि वर्ष 1857 के उस रविवार और आज के रविवार में एक अद्भुत समानता है – वही तारीख और वही दिन। लेकिन इस समानता के बीच समय का एक लंबा फासला है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जिस आजादी की नींव मेरठ की उन गलियों में रखी गई थी, उसे एक नागरिक के तौर पर हमने कितना समझा है। 10 मई 1857 की उस शाम मेरठ छावनी में जब भारतीय सैनिकों ने विद्रोह का बिगुल फूंका, तो वह केवल एक सैन्य बगावत नहीं थी। वह बरसों से दबे हुए उस गुस्से की आवाज थी, जो ब्रिटिश शासन के जुल्म और बेइज्जती के खिलाफ पनप रहा था।
अक्सर कहा जाता है कि बगावत चर्बी वाले कारतूसों की वजह से हुई, लेकिन असल में यह लड़ाई अपनी मिट्टी और अपनी पहचान को बचाने की थी। सोचिए, उस दौर में न तो आज की तरह मोबाइल फोन थे और न ही इंटरनेट। उन सैनिकों के पास लड़ने के लिए न तो बहुत आधुनिक हथियार थे और न ही सुख-सुविधाएं। इसके बावजूद उन्होंने ‘रोटी और कमल’ जैसे साधारण प्रतीकों के जरिए पूरे देश को जोड़ दिया। यह जुड़ाव इतना मजबूत था कि आज की इस सूचना क्रांति के दौर में भी वह एक मिसाल है। मेरठ से दिल्ली की ओर बढ़ने वाले उन क्रांतिकारियों के बीच धर्म, जाति या इलाके की कोई दीवार नहीं थी। उस वक्त उनके सामने सिर्फ एक ही लक्ष्य था – देश को गुलामी की जंजीरों से बाहर निकालना। हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सैनिकों ने आपसी मतभेद भुलाकर कंधे से कंधा मिलाया और दिल्ली के तख्त को अपना नेतृत्व सौंपा। भारतीय एकता के उस सुनहरे दौर को आज के विखंडित होते समाज मे फिर से याद करने की बहुत जरूरत है। लेकिन जब हम आज के हालात में उस महान क्रांति को देखते हैं, तो कई कड़वी सच्चाईयां सामने आती हैं।
आजादी मिले साढ़े सात दशक बीत चुके हैं, पर क्या हम वाकई एक जागरूक और चेतना संपन्न नागरिक बन पाए हैं? आज हमारे पास संविधान से मिले अधिकार तो हैं, परंतु हम उनके लिए लड़ना नहीं जानते और जब उन्हीं अधिकारों के साथ जुड़ी अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की बात आती है, तो हम अक्सर मुंह फेर लेते हैं। आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम आजादी का मतलब सिर्फ ‘बाधाओं से मुक्ति’ या अपनी मनमर्जी करना समझ बैठे हैं। हमें लगता है कि आजादी का मतलब है कि हमारे ऊपर कोई रोक-टोक न हो, जबकि असली आजादी खुद पर नियंत्रण रखने और अपने उत्तरदायित्वों को निभाने में है।
सार्वजनिक जगहों पर गंदगी फैलाना, ट्रैफिक के नियमों को मजाक समझना और आपस में बढ़ती कड़वाहट – ये सब इस बात का प्रमाण हैं कि हमें अपने हक तो याद हैं, लेकिन हम अपने कर्तव्यों के मामले में बिल्कुल मौन हैं। हमें यह समझना होगा कि 10 मई की वह क्रांति केवल अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने के लिए नहीं थी, बल्कि एक ऐसे स्वाभिमानी राष्ट्र के निर्माण के लिए थी जहाँ हर इंसान की इज्जत हो। तो खुद से पूछना चाहिए कि आज बतौर नागरिक हमारी वो इज्ज़त है, जिसके लिए हमारे पुरखे लड़े। क्या हम उन शहीदों के सपनों जैसा समाज बना पा रहे हैं? 10 मई का यह ऐतिहासिक दिन हमें केवल पुराने गौरव को याद करने का मौका नहीं देता, बल्कि हमें आगाह भी करता है। यह याद दिलाता है कि आजादी खैरात में मिली कोई चीज नहीं है, बल्कि यह एक साधना है जिसे हर नागरिक को अपने अच्छे आचरण से बचाकर रखना पड़ता है। अगर हम वाकई उन क्रांतिकारियों को सम्मान देना चाहते हैं, तो हमें अपनी आजादी को अनुशासन के साथ जीना होगा। जिस दिन हम अपनी नागरिक जिम्मेदारियों को अपने अधिकारों के बराबर खड़ा कर देंगे, उसी दिन 1857 की वह क्रांति सही मायने में सफल मानी जाएगी।





