फिल्मों से फकीरी तक: सरदार सिंह सूरी की अनोखी जीवन यात्रा

From films to asceticism: The unique life journey of Sardar Singh Suri

मुंबई (अनिल बेदाग): कुछ शख्सियतें सिर्फ अपनी कामयाबी से नहीं, बल्कि अपने जज़्बे और सेवा से इतिहास लिखती हैं। सरदार सिंह सूरी उन्हीं में से एक थे, जिन्होंने फिल्मी दुनिया में सितारों को मंच दिया और बाद में इंसानियत को अपना असली मिशन बना लिया। उनकी 7वीं पुण्यतिथि पर चार बंगला गुरुद्वारा साहिब में उमड़ा जनसैलाब इस बात का प्रमाण था कि सेवा की रोशनी कभी बुझती नहीं।

फिल्म निर्माता के रूप में सूरी साहब ने पंजाबी सिनेमा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी फिल्म “ एह धरती पंजाब दी ” ने न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की, बल्कि सामाजिक सौहार्द का संदेश भी दिया। इस फिल्म के जरिए प्रेम चोपड़ा जैसे कलाकारों को पहचान मिली, जबकि मोहम्मद रफी की आवाज़ ने इसे अमर बना दिया।

लेकिन उनकी असली कहानी संघर्ष से शुरू होती है—रावलपिंडी से विस्थापन, अंबाला में नई शुरुआत और फिर मुंबई में टैक्सी ड्राइवर के रूप में जीवनयापन। हालात ने उन्हें बार-बार परखा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 1967 में गुरुद्वारे की नींव रखकर उन्होंने सेवा का जो बीज बोया, वह आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है।

आज वही गुरुद्वारा रोज़ हजारों लोगों को भोजन, शिक्षा और सहारा देता है, धर्म, जाति और वर्ग से परे। कोरोना काल हो या प्राकृतिक आपदा, हर संकट में यह सेवा केंद्र उम्मीद की किरण बना। उनके बेटे जसपाल सिंह सूरी और मनिंदर सिंह सूरी इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। सरदार सिंह सूरी का जीवन हमें यह सिखाता है कि असली सफलता वही है, जो दूसरों के जीवन में रोशनी भर दे।