दिल्ली में कब टूटने रुकेंगे मेहनतकशों के आशियाने

When will the demolition of the homes of the working class in Delhi stop?

अब शायद ही कोई दिन गुजरता हो जब गरीबों के आशियानों पर बुलडोजर ना चलता हो। दरअसल दिल्ली में विकास के नाम पर बीते दशकों से लाखों लोगों के आशियानों को तोड़कर इमारतें बनती रही हैं। सवाल उठता है कि दशकों से एक जगह पर बसे परिवारों को उनके आशियाने से क्यों हटाया जाता है। क्या कोई ठोस और मानवीय नीति नहीं बनाई जा सकती।

विवेक शुक्ला

अब शायद ही कोई दिन गुजरता हो जब गरीबों के आशियानों पर बुलडोजर ना चलता हो। दरअसल दिल्ली में विकास के नाम पर बीते दशकों से लाखों लोगों के आशियानों को तोड़कर इमारतें बनती रही हैं। सवाल उठता है कि दशकों से एक जगह पर बसे परिवारों को उनके आशियाने से क्यों हटाया जाता है। क्या कोई ठोस और मानवीय नीति नहीं बनाई जा सकती। बीती कुछ सरकारों ने झुग्गी निवासियों के लिए फ्लैट बनाने की पहल की, लेकिन समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है।

स्वतंत्रता के बाद दिल्ली में तेजी से आबादी बढ़ी। ग्रामीण क्षेत्रों से आए मजदूरों ने शहर के कोनों में झुग्गियां बसाईं। 1956 के स्लम एरिया इम्प्रूवमेंट एंड क्लियरेंस एक्ट के तहत शुरू हुईं स्लम क्लियरेंस स्कीम। इमरजेंसी काल 1975-77 में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ हुई। तुर्कमान गेट में बड़ी संख्या में सरकारी जमीन पर बने घर तोड़े गए। उन्हें रंजीत नगर में बसाया गया। जानकारों ने बताया कि 1990 से 2003 के बीच दिल्ली में करीब 51,461 घर तोड़े गए। 2004-2007 के बीच और 45,000 से ज्यादा।

दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड के अनुसार शहर में 675 से ज्यादा मान्यता प्राप्त जेजे क्लस्टर हैं, जिनमें लाखों परिवार रहते हैं। अनुमान है कि दिल्ली की आबादी का करीब 20-30 प्रतिशत हिस्सा इन घनी बस्तियों में बसता है। सोशल वर्कर प्रीतम धारीवाल कहते हैं कि चाणक्यपुरी में बांग्लादेश दूतावास तथा ताज महल और मौर्या होटलों के आसपास की झुग्गियां सुरक्षा और विकास के नाम पर हटाई गईं। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि राजनयिक इलाकों, पर्यटन और आर्थिक हितों को प्राथमिकता दी जाती है। झुग्गी हटाने के पीछे मुख्य कारण शहरी विकास, मास्टर प्लान और अतिक्रमण हैं। दिल्ली मास्टर प्लान 2021 और 2041 में स्लम-फ्री शहर का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन अमल में तोड़फोड़ प्रमुख रहती है। सड़क विस्तार, मेट्रो, कमर्शियल प्रोजेक्ट, ग्रीन बेल्ट और नदी किनारे की सफाई जैसे कार्यों के लिए जमीन चाहिए। जी20 समिट से पहले भी बड़े पैमाने पर डेमोलिशन हुए।

तुर्कमान गेट- 1975 से 2026

दिल्ली में घरों या दुकानों को तोड़ने की बात होती है तो तुर्कमान गेट की याद आना लाजिमी है। एक 1975 की इमरजेंसी की काली रात, और दूसरी 2026 की ठंडी जनवरी की आधी रात। 1975 की वह अप्रैल की सुबह। तब इमरजेंसी का दौर था। तुर्कमान गेट में बने अवैध निर्माण पर बुलडोजर चले। “अतिक्रमण हटाओ,” चिल्लाते हुए अधिकारी आए। तुर्कमान गेट के सोशल वर्कर मकसूद अहमद कहते हैं कि जब वहां पुलिस एक्शन हो रहा था तब संजय गांधी करीब के रणजीत होटल में बैठकर पल –पल की जानकारी ले रहे थे। पुलिस एक्शन का लोगों ने विरोध किया। वे रहे थे, “यह हमारा घर है, सदियों से यहां रहते हैं।” अब रणजीत होटल भी खत्म हो चुका है।

तब दिल्ली पुलिस और स्थानीय लोगों में जमकर संघर्ष हुआ। बहुत सारे लोग घायल हुए। विस्थापित लोगों को करोल बाग के आगे रणजीत नगर में प्लाट मिले थे। वहां पर रहते हुए उन्हें अब आधी सदी हो रही है। जो लोग तुर्कमान गेट से रणजीत नगर भेजे गए थे अब उनके बच्चे और बच्चों के बच्चे भी बड़े हो चुके हैं। बच्चों ने तो तुर्कमान गेट की कहानियां ही सुनी हैं।

समय बीता, तोड़फोड़ जारी रही

तब से दिल्ली बदलती गई। लेकिन पुरानी दिल्ली की गलियां वैसी ही संकरी रहीं। और फिर, 6 जनवरी 2026 की आधी रात एक बार फिर से तुर्कमान गेट में 1975 की यादें ताजा हो गईं। दिल्ली की सर्द रात के कारण आसपास सब लोग घरों में दुबके हुए थे। तब दिल्ली नगर निगम ने अतिक्रमण हटाने का अभियान शुरू किया। वहां पर दिल्ली पुलिस के भी बहुत सारे जवान थे। फाइज-ए-इलाही मस्जिद के आसपास की जमीन पर बने अवैध निर्माणों को निशाना बनाया गया। आधिकारिक तौर पर सुबह 8 बजे शुरू होना था, लेकिन बुलडोजर रात 1:30 बजे ही आए।

शोर से लोग जाग गए कोलाहल के कारण। वे घर से बाहर आए। कुछ देर के बाद पत्थरबाजी शुरू हो गई। पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे। 1975 की यादें घूम गईं। लोग फिर से जगमोहन को कोस रहे थे। कुछ ने कहा, “यह 1975 की पुनरावृत्ति है,” जबकि सरकार ने इसे ‘कानूनी कार्रवाई’ बताया। खैर, तुर्कमान गेट के साथ 1975 के साथ अब 2026 भी जुड़ गया। जगमोहन कहते थे कि उन्हें तुर्कमान गेट की कार्रवाई का जिम्मेदारी माना जाता है। पर वे तो कोर्ट के आदेश का पालन कर रहे थे। अब वे भी गुजर चुके हैं। उन्होंने एक बार इस लेखक को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में बताया था कि उन्होंने ही दिल्ली में पहली बार 1955 में नबी करीब के पास अतिक्रमण हटाए थे। तब भी बहुत बवाल हुआ था।

एक बात याद रखे कि अधिकांश बस्तियां सरकारी जमीन पर हैं.जु पर बुलडोजर चलता है। ये रेलवे, डीडीए, एमसीडी या अन्य एजेंसियों की होती है। यहां रहने वाले दशकों पुराने दस्तावेज रखते हैं, फिर भी उन्हें अवैध माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश अक्सर हटाने के पक्ष में होते हैं, जबकि पुनर्वास अपर्याप्त रहता है।

शीला दीक्षित सरकार ने 2007 में कम लागत वाले फ्लैट बनाने का फैसला किया। कालकाजी हजारों फ्लैट बने, लेकिन कई खाली पड़े रहे और आवंटन में देरी हुई। आम आदमी पार्टी की सरकार ने 2015 में दिल्ली स्लम एवं जेजे रिहैबिलिटेशन एंड रिलोकेशन पॉलिसी लाई।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत भी काम हुआ। हाल ही में 2026 पॉलिसी की चर्चा हुई, जिसमें स्थायी आवास पर जोर है।विस्थापन केवल घर नहीं छीनता। महिलाओं और बच्चों पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है। शिक्षा बाधित होती है, स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती हैं, रोजगार छिन जाता है। कई अध्ययनों में पाया गया कि विस्थापित परिवार पुरानी आमदनी का आधा भी नहीं कमा पाते। दिल्ली की अर्थव्यवस्था इन मजदूरों पर निर्भर है, फिर भी उन्हें समस्या माना जाता है।

समय आ गया है कि दिल्ली एक समावेशी मानवीय नीति बनाए। 2025 कट-ऑफ के आधार पर ताजा सर्वे कर सभी बस्तियों को मान्यता दी जाए। झुग्गियों में रहने वालों को भी इस देश का नागरिक माना जाए। स्थानीय लोगों, एनजीओ और विशेषज्ञों की भागीदारी से योजना बनाई जाए। रोजगार लिंकेज और सामुदायिक सुविधाएं दी जाएं। मास्टर प्लान 2041 में स्लम को विकास का अंग माना जाए।

दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड और डीडीए की जिम्मेदारी है कि वे इन दिशाओं में ठोस कदम उठाएं। दिल्ली को विश्व स्तरीय शहर बनाने का सपना तभी पूरा होगा जब गरीब भी उसका हिस्सा महसूस करेंगे। विकास सबका होना चाहिए, न कि कुछ चुनिंदा लोगों का। झुग्गी तोड़ना आसान है, लेकिन लाखों परिवारों को सम्मानजनक जीवन देना असली चुनौती है। शीला दीक्षित और आप के प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए एक लंबी अवधि की मानवीय नीति बनानी होगी, ताकि विकास की आंधी में कोई आशियाना न उजड़े।