दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ने के लिये भाजपा की रूपरेखा

BJP's roadmap to secure a two-thirds majority

ललित गर्ग

भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) न केवल सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित है, बल्कि वह देश की राजनीति की दिशा और दशा निर्धारित करने वाली केंद्रीय शक्ति भी बन चुकी है। वर्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद 2024 के आम चुनाव में भाजपा अपने दम पर बहुमत से कुछ पीछे अवश्य रह गई, लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ मिलकर उसने पुनः सरकार बनाई। लोकसभा में भाजपा के 240 और एनडीए के 293 सांसदों के साथ केंद्र में सरकार का गठन इस तथ्य का संकेत है कि भाजपा की राजनीतिक स्वीकार्यता अभी भी व्यापक बनी हुई है। इसके समानांतर, विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा के लगातार मजबूत प्रदर्शन ने यह स्पष्ट किया है कि पार्टी केवल केंद्र की सत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक व्यापक संगठनात्मक और वैचारिक विस्तार की प्रक्रिया में है। पश्चिम बंगाल जैसे प्रांत में उसने बहुमत से अपनी सरकार बना ली है, दक्षिण के प्रांतों में भी अपना वर्चस्व स्थापित करने की दृष्टि से नये प्रतिमान बनाये हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या भाजपा भविष्य में संसद में दो-तिहाई अथवा उससे भी अधिक बहुमत प्राप्त करने की दिशा में बढ़ रही है? यदि हाँ, तो इसके उद्देश्य क्या हैं, इसकी रणनीति क्या है और भारतीय लोकतंत्र पर इसके क्या प्रभाव पड़ सकते हैं?

2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 240 सीटें प्राप्त हुईं। यह संख्या 2019 की तुलना में कम अवश्य थी, किन्तु विपक्षी दलों की तुलना में वह अभी भी काफी आगे रही। सहयोगी दलों-विशेषकर तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) और जनता दल (यूनाइटेड) के समर्थन से एनडीए ने 293 सीटों का आंकड़ा पार कर सरकार बनाई। राज्यों में भी भाजपा का प्रभाव लगातार बना हुआ है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसकी सफलता ने हिंदी पट्टी में उसकी पकड़ को मजबूत बनाए रखा। असम, उत्तराखंड, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी पार्टी अपनी राजनीतिक शक्ति को बनाए रखने में सफल रही है। बिहार में तो भाजपा शासन कर रही है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और ओडिशा जैसे राज्यों में भी वह अपने जनाधार का निरंतर विस्तार करने के प्रयास में लगी हुई है। पंजाब ही ऐसा प्रांत है, जहां उसे पश्चिम बंगाल जैसा करिश्मा दिखाना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा अब केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक दीर्घकालिक राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की रणनीति पर कार्य कर रही है।

भाजपा के बढ़ते वर्चस्व के बीच एक बड़ा प्रश्न है कि आखिर वह दो-तिहाई बहुमत की ओर क्यों बढ़ना चाहती है? क्योंकि भारतीय संविधान में कई महत्वपूर्ण संशोधनों तथा बड़े विधायी सुधारों के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। इसी कारण भाजपा के भीतर और राजनीतिक गलियारों में समय-समय पर ‘सुपर मेजॉरिटी’ अर्थात् दो-तिहाई बहुमत की चर्चा होती रही है। यदि लोकसभा में किसी दल अथवा गठबंधन के पास लगभग 360 सीटें हों, तो वह संवैधानिक संशोधनों और बड़े संरचनात्मक परिवर्तनों को अपेक्षाकृत आसानी से लागू कर सकता है। भाजपा के संदर्भ में जिन प्रमुख विषयों को इससे जोड़ा जाता है, उनमें प्रमुख हैं-एक देश, एक चुनाव, समान नागरिक संहिता, महिला आरक्षण का प्रभावी क्रियान्वयन, परिसीमन की प्रक्रिया एवं प्रशासनिक एवं चुनावी सुधार। भाजपा इन विषयों को ‘राष्ट्रहित’ और ‘सुशासन’ की दृष्टि से प्रस्तुत करती रही है, जबकि विपक्ष इनके राजनीतिक और संघीय प्रभावों पर प्रश्न उठाता रहा है। यही कारण है कि दो-तिहाई बहुमत की बहस केवल चुनावी नहीं, बल्कि वैचारिक और संवैधानिक भी बन जाती है।

विकसित भारत- भाजपा का दीर्घकालिक एजेंडा है, भाजपा ने सदैव ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य सामने रखा है। स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे होने तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की यह परिकल्पना पार्टी की दीर्घकालिक राजनीतिक दृष्टि का आधार है। इस लक्ष्य के अंतर्गत कुछ प्रमुख प्राथमिकताएँ दिखाई देती हैं-

  1. आर्थिक आत्मनिर्भरता
    ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान भाजपा सरकार की प्रमुख नीति रही है। इसका उद्देश्य भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना है। सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, हरित ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने की दिशा में सरकार कार्य कर रही है। भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य भी इसी रणनीति का हिस्सा है।
  2. आधारभूत संरचना का विस्तार
    गत एक दशक में राजमार्ग, एक्सप्रेस-वे, रेलवे, मेट्रो नेटवर्क, हवाई अड्डे, जलमार्ग तथा डिजिटल अवसंरचना के विकास पर विशेष बल दिया गया है। बुलेट ट्रेन परियोजना, 5जी एवं भविष्य की 6जी तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चार्जिंग नेटवर्क तथा लॉजिस्टिक कॉरिडोर इसी सोच के विस्तार हैं। भाजपा मानती है कि मजबूत आधारभूत संरचना ही विकसित भारत की नींव बनेगी।
  3. कल्याणकारी योजनाएँ और अंत्योदय
    भाजपा की चुनावी सफलता का एक प्रमुख आधार उसकी कल्याणकारी योजनाएँ रही हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, मुफ्त राशन योजना, जल जीवन मिशन तथा किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं ने व्यापक जनसमर्थन तैयार किया है। विशेष रूप से गरीब, महिलाएँ और ग्रामीण वर्ग भाजपा के प्रमुख सामाजिक आधार के रूप में उभरे हैं। ‘लखपति दीदी’ जैसी योजनाएँ महिला सशक्तिकरण को नई दिशा देने का प्रयास हैं।
  4. राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकीकरण
    भाजपा की वैचारिक राजनीति का केंद्र राष्ट्रवाद रहा है। अनुच्छेद 370 का निरसन, राम मंदिर निर्माण, सीमा सुरक्षा, रक्षा आधुनिकीकरण और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दे उसकी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ‘एक देश, एक चुनाव’ तथा समान नागरिक संहिता जैसे प्रस्तावों को भी पार्टी राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में प्रस्तुत करती है।
    भाजपा नए क्षेत्रों में विस्तार की रणनीति को लेकर आगे बढ़ रही है। भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषता उसका मजबूत संगठन और विस्तारवादी दृष्टिकोण है। हिंदी पट्टी में सुदृढ़ आधार बनने के बाद पार्टी अब दक्षिण और पूर्वी भारत में अपनी राजनीतिक उपस्थिति को मजबूत करने पर केंद्रित है। तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में संगठन विस्तार, स्थानीय नेतृत्व को प्रोत्साहन तथा क्षेत्रीय मुद्दों को अपनाने की रणनीति पर कार्य किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में भाजपा का बढ़ता वोट प्रतिशत इस बात का संकेत है कि पार्टी नए राजनीतिक भूगोल तैयार करने की कोशिश कर रही है। दक्षिण भारत में भी पार्टी धीरे-धीरे अपने लिए राजनीतिक अवसर तलाश रही है।
    अपने महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं राष्ट्रवादी उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये भाजपा जीत के नए आंकड़ों की जुगत में लगी है। इसमें उसे सफलता भी मिल रही है। निश्चित तौर पर भाजपा की चुनावी राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका अत्यंत व्यवस्थित और वैज्ञानिक चुनाव प्रबंधन है। बूथ स्तर तक संगठन, डिजिटल प्रचार, सोशल मीडिया का व्यापक उपयोग, लाभार्थी वर्गों से सीधा संवाद और मजबूत नेतृत्व-ये सभी उसकी चुनावी सफलता के प्रमुख आधार हैं। इसके अतिरिक्त, भाजपा निरंतर नए सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास करती रही है। दलित, पिछड़े वर्ग, महिलाएँ, युवा और प्रथम मतदाता उसके विशेष लक्ष्य समूह हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की रणनीति केवल वर्तमान चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक गठबंधन निर्मित करने की है, जिससे वह भविष्य में और बड़े बहुमत की ओर बढ़ सके।
    इन निरन्तर मिलती सफलताओं के बावजूद भाजपा के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं है। हालाँकि भाजपा की राजनीतिक स्थिति मजबूत है, लेकिन उसकी सफलता का सबसे बड़ा रहस्य यह है िकवह अपने सामने कई चुनौतियाँ को बहुत गंभीरता से लेती है। बेरोजगारी, महँगाई, कृषि संकट, सामाजिक धू्रवीकरण, संघीय ढाँचे को लेकर उठने वाले प्रश्न तथा क्षेत्रीय दलों की चुनौती ऐसे मुद्दे हैं जिनसे उसे लगातार जूझना पड़ रहा है। 2024 के लोकसभा चुनावों ने यह भी संकेत दिया कि केवल करिश्माई नेतृत्व ही पर्याप्त नहीं है; स्थानीय मुद्दे, सामाजिक समीकरण और आर्थिक अपेक्षाएँ भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि कोई दल अत्यधिक बहुमत प्राप्त करता है, तो लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष की भूमिका, संस्थागत संतुलन और संघीय संरचना को लेकर बहस स्वाभाविक रूप से तेज हो जाती है। इसलिए भाजपा के लिए यह आवश्यक होगा कि वह राजनीतिक विस्तार के साथ लोकतांत्रिक सहमति और संवाद की परंपरा को भी मजबूत करे।
    अन्य राजनीतिक दलों की तुलना में भारतीय जनता पार्टी की विशेषता उसकी सुदृढ़ संगठनात्मक संरचना, वैचारिक स्पष्टता, राष्ट्रवाद आधारित दृष्टिकोण तथा अनुशासित कार्यकर्ता-व्यवस्था में देखी जाती है। पार्टी ने बूथ स्तर तक मजबूत संगठन खड़ा कर जनसंपर्क और जनभागीदारी को विशेष महत्व दिया है। नरेंद्र मोदी की नीतियों में आत्मनिर्भर भारत, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत, गरीब कल्याण, आधारभूत संरचना विकास तथा वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा को सशक्त बनाने की स्पष्ट दृष्टि दिखाई देती है। वहीं अमित शाह की राजनीतिक रणनीतियों और संगठनात्मक कौशल ने पार्टी के विस्तार, चुनावी प्रबंधन तथा विभिन्न राज्यों में संगठन को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समर्थकों के अनुसार, इन नीतियों और रणनीतियों ने भाजपा को एक व्यापक जनाधार वाली तथा निर्णायक नेतृत्व वाली राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया है।
    भारतीय जनता पार्टी आज देश की सबसे संगठित, संसाधन-संपन्न और व्यापक जनाधार वाली राजनीतिक पार्टी के रूप में स्थापित है। वह केवल सत्ता संचालन तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि ‘विकसित भारत 2047’ के अपने दीर्घकालिक एजेंडे को मूर्त रूप देने के लिए बड़े राजनीतिक जनादेश की आकांक्षा रखती है। दो-तिहाई बहुमत की उसकी अभिलाषा इसी व्यापक राजनीतिक परियोजना का हिस्सा प्रतीत होती है। इसके लिए पार्टी नए सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्रों में विस्तार, कल्याणकारी योजनाओं के प्रसार, राष्ट्रवादी विमर्श और संगठनात्मक सुदृढ़ता पर लगातार कार्य कर रही है। फिर भी लोकतंत्र की सफलता केवल बहुमत से नहीं, बल्कि सहमति, संवेदनशीलता, जवाबदेही और संस्थागत संतुलन से सुनिश्चित होती है। इसलिए भाजपा के भविष्य का वास्तविक मूल्यांकन केवल उसके चुनावी आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से होगा कि वह अपने बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को लोकतांत्रिक मूल्यों, समावेशी विकास और राष्ट्रीय सहमति के साथ किस प्रकार संतुलित करती है।