गोपेन्द्र नाथ भट्ट
राजस्थान विधानसभा के 75 वर्षों की गौरवशाली संसदीय यात्रा पर विधानसभा के अमृत महोत्सव के प्रथम कार्यक्रम का शुभारंभ कोई औपचारिक समारोह मात्र नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं, संसदीय संस्कृति और नए पुराने जनप्रतिनिधियों के सामूहिक दायित्व का ऐसा जीवंत उत्सव था, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की पहल पर आयोजित वर्तमान और पूर्व विधायकों के इस अभूतपूर्व समागम ने सचमुच विधानसभा के भव्य भवन में “विधायी महाकुंभ” का लोमहर्षक स्वरूप ग्रहण कर लिया।
बुधवार को विधानसभा के ऐतिहासिक सदन में जैसे ही विभिन्न कालखंडों में जनता का प्रतिनिधित्व कर चुके जनप्रतिनिधि एक साथ पहुंचे, तो वहाँ वर्षों पुरानी स्मृतियां मानो सजीव हो उठीं। किसी ने अपने पहले भाषण को याद किया, किसी ने संसदीय बहसों के संस्मरण साझा किए तो कई पूर्व विधायक लंबे अंतराल के बाद सदन में प्रवेश कर और अपने पुराने साथियों से मिल कर भावुक हो उठे। यह दृश्य केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति समर्पण और सम्मान का यथार्थ प्रतीक बन हर किसी के दिल को छू गया । विशेष कर राज्य के भरतपुर अंचल से से आए 100 वर्ष से अधिक उम्र के की आयु के राजस्थान के दिग्गज समाजवादी नेता और स्वतंत्रता सेनानी पण्डित रामकिशन तथा सीकर जिले के दातारामगढ़ विधानसभा क्षेत्र से सात बार विधायक 93 वर्ष के नारायण सिंह सभी के आकर्षण का केन्द्र बने जो कि सुबह दस से शाम छह बजे तक सदन में उपस्थित रहे । उप राष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन, गवर्नर हरिभाऊ बागड़े , मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा और विधानसभा स्पीकर वासुदेव देवनानी मंच से उतर कर उन्हें सम्मानित करने उनकी सीट तक गए । राजस्थान विधान सभा के सदस्य और राजस्थान के मंत्री रहें पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया और छह से अधिक बार विधायक रहें विधायकों को भी सम्मानित किया गया।
समारोह की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यहां दलगत सीमाएं पूरी तरह गौण दिखाई दीं। सत्ता और विपक्ष, वर्तमान और पूर्व, वरिष्ठ और युवा—सभी एक ही उद्देश्य से एक मंच पर उपस्थित थे। लोकतंत्र के इस विराट परिवार का यह मिलन अपने आप में एक ऐतिहासिक संदेश था कि विचारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति आज भी सभी का सम्मान एक समान है।
विधायी गौरव यात्रा के इस अनूठे कार्यक्रम के समापन सत्र के मुख्य अतिथि देश के उपराष्ट्रपति और संसद के ऊपरी सदन के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने इस भावपूर्ण समारोह को विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की एक “अनूठी पहल” बताते हुए कहा कि वर्तमान और पूर्व विधायकों का यह समागम भारतीय संसदीय परंपराओं का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात की सराहना की कि पूरे आयोजन में राजनीति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और आत्मीयता का वातावरण दिखाई दिया।
इसके पहले एक दिवसीय इस कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी इसे “विधायकों का महाकुंभ” बताते हुए कहा कि ऐसी कल्पना करना और उसे सफलतापूर्वक साकार करना अत्यंत प्रेरणादायी कार्य है। उनके अनुसार यह आयोजन केवल राजस्थान विधानसभा के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश की विधानसभाओं के लिए अनुकरणीय मॉडल बन सकता है।
इस ऐतिहासिक समागम की भव्यता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसमें 410 जनप्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें 237 पूर्व विधायक, 163 वर्तमान विधायक तथा 10 अन्य पूर्व विधायक भी शामिल थे, जिन्होंने पूर्व पंजीकरण नहीं कराया था, फिर भी वे इस अवसर का हिस्सा बनने के लिए पहुंचे। यह संख्या स्वयं इस आयोजन की लोकप्रियता और उसके महत्व को प्रमाणित करती है। समारोह के दौरान पूर्व और वर्तमान जनप्रतिनिधियों ने विधानसभा की गौरवशाली संसदीय परंपराओं और सदन में पारित कानूनों विशेष कर देश में सबसे पहलें जागीदारी प्रथा को समाप्त करने तथा भुमि सुधार और अन्य कानूनों का स्मरण किया। सदन में पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डॉ सी पी जोशी द्वारा सदन संचालन के दृश्य भी दिखें । पूर्व और वर्तमान विधायकों के बीच लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, जनसेवा की प्रतिबद्धता और भविष्य की चुनौतियों पर भी सार्थक संवाद हुआ। अनुभव और ऊर्जा का यह संगम लोकतंत्र को और अधिक सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश देकर गया। इस अवसर पर नेता प्रतिपक्ष श्री टीकाराम जूली एवं संसदीय कार्य मंत्री श्री जोगाराम पटेलभी उपस्थित रहे ।
राजस्थान विधानसभा का यह “विधायी महाकुंभ” केवल अमृत महोत्सव का एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति के संरक्षण, संवाद और समन्वय का ऐसा ऐतिहासिक अध्याय बन गया है, जिसकी चर्चा अब पूरे देश में हो रही है। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि संस्थाओं के प्रति सम्मान, परंपराओं के संरक्षण और पीढ़ियों के बीच सतत संवाद से सशक्त होता है। यही इस महाकुंभ की सबसे बड़ी उपलब्धि और स्थायी विरासत है।





