आज पाकिस्तान इतिहास के सबसे खतरनाक और अंधकारमय मोड़ पर खड़ा है !

Today, Pakistan stands at the most dangerous and darkest juncture of its history!

अशोक भाटिया

आज पाकिस्तान इतिहास के उस सबसे खतरनाक और अंधकारमय मोड़ पर खड़ा है, जहां से वापसी का हर रास्ता बंद दिखाई देता है। वर्ष 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के अलग होने के बाद, इस्लामाबाद के सैन्य और असैन्य नेतृत्व ने इतिहास की उस भीषण त्रासदी से कोई सबक नहीं सीखा। वर्तमान में सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, कूटनीति और आंतरिक संप्रभुता के मोर्चों पर जैसी बहुआयामी चुनौतियां एक साथ खड़ी हैं, वे यह गंभीर सवाल पैदा करती हैं कि क्या पाकिस्तान एक बार फिर टुकड़े-टुकड़े होने की कगार पर आ पहुंचा है? यह संकट केवल राजनीतिक अस्थिरता या कुछ दलों की आपसी खींचतान का नहीं है, बल्कि यह आधुनिक इतिहास में किसी राज्य (State) के बुनियादी ढांचे और उसकी वैचारिक नींव के पूरी तरह ढह जाने का सबसे जीवंत उदाहरण है।

पाकिस्तान की स्थापना जिस ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ के आधार पर हुई थी, वह 1971 में ही दम तोड़ चुका था, लेकिन आज जो स्थिति है वह उससे भी कहीं अधिक भयावह है। आज संकट केवल एक हिस्से के अलग होने का नहीं, बल्कि पूरे देश के एक गृहयुद्ध की आग में झुलसकर कई स्वायत्त, हिंसक और अनियंत्रित गुटों में बंट जाने का है। जब किसी देश की सेना, न्यायपालिका, संसद और नागरिक समाज एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हो जाएं, तो उस राष्ट्र के मानचित्र को बदलने से कोई बाहरी ताकत नहीं रोक सकती।

किसी भी संप्रभु राष्ट्र की रीढ़ उसकी अर्थव्यवस्था होती है, और पाकिस्तान की यह रीढ़ इस समय पूरी तरह टूट चुकी है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से बार-बार मिलने वाले ‘बेलआउट पैकेज’ भी देश की डूबती नैया को पार लगाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। वर्तमान में पाकिस्तान पर विदेशी कर्ज लगभग $290 अरब तक पहुंच चुका है, जो उसकी सकल घरेलू उत्पाद का 70 प्रतिशत से अधिक है। इस कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए पाकिस्तान को नया कर्ज लेना पड़ रहा है, जो उसे एक कभी न खत्म होने वाले ‘डेथ ट्रैप’ में धकेल चुका है।

देश के भीतर आर्थिक हालात यह हैं कि बढ़ती महंगाई ने आम नागरिकों का जीना मुहाल कर दिया है। विदेशी मुद्रा भंडार की भारी कमी के कारण जरूरी दवाओं, कच्चे माल और पेट्रोलियम पदार्थों का आयात ठप हो चुका है। ईंधन और बिजली की अभूतपूर्व किल्लत के कारण सरकार को चार दिन का कार्य सप्ताह लागू करने, बाजारों को शाम होते ही बंद करने और स्कूलों को बंद रखने जैसे आपातकालीन उपाय करने पड़े हैं।

जब कोई परमाणु संपन्न देश बुनियादी ऊर्जा, आटा और जीवन रक्षक दवाओं के लिए दुनिया के सामने कटोरा फैलाने को मजबूर हो जाए, तो उसकी संप्रभुता केवल कागजों तक सीमित रह जाती है। विश्व बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाओं की कड़ी शर्तों ने पाकिस्तान के आम आदमी की कमर तोड़ दी है, जिससे जनता का अपनी सरकार और राज्य व्यवस्था पर से विश्वास पूरी तरह उठ चुका है। यह आर्थिक पतन ही है जो बलूचिस्तान, सिंध और खैबर पख्तूनख्वा जैसे प्रांतों में अलगाववाद की आग में घी डालने का काम कर रहा है।

सैन्य और रणनीतिक मोर्चे पर, पाकिस्तान अपनी ही भौगोलिक सीमाओं के भीतर एक भीषण, अदृश्य और बहुआयामी युद्ध लड़ रहा है। बलूचिस्तान प्रांत में अलगाववादी आंदोलन अब महज एक असंतोष नहीं, बल्कि पूरी तरह से एक संगठित गुरिल्ला युद्ध में बदल चुका है। बलूच लिबरेशन आर्मी और माजिद ब्रिगेड जैसे संगठनों ने अपनी रणनीति बदलते हुए छिटपुट हमलों की जगह पाकिस्तानी सेना के कोर मुख्यालयों और रणनीतिक ठिकानों पर सीधे और समन्वित हमले शुरू कर दिए हैं। हाल ही में सेना के “ऑपरेशन शबान” के खिलाफ बलूच विद्रोहियों की हिंसक प्रतिक्रिया ने यह साबित कर दिया है कि बलूचिस्तान के एक बड़े हिस्से पर इस्लामाबाद का प्रशासनिक नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो चुका है और वहां सेना केवल अपनी चौकियां बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।

दूसरी तरफ, उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थिति और भी बदतर है। डूरंड रेखा के पार से संचालित होने वाले तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के कई जिलों में अपनी समानांतर सरकार स्थापित कर ली है। टीटीपी के लड़ाके अत्याधुनिक अमेरिकी हथियारों से लैस हैं, जो उन्हें अफगानिस्तान में मिले थे। वे पाकिस्तानी पुलिस और अर्धसैनिक बलों पर रोजाना आत्मघाती हमले कर रहे हैं।

इस परिदृश्य का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि अब वैचारिक रूप से भिन्न होने के बावजूद बलूच अलगाववादी (जो धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद की बात करते हैं) और टीटीपी जैसे धार्मिक कट्टरपंथी संगठन पाकिस्तानी राज्य व्यवस्था के खिलाफ एक साझा मोर्चा बना रहे हैं। ये संगठन न केवल सुरक्षा बलों को निशाना बना रहे हैं, बल्कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की अरबों डॉलर की परियोजनाओं और चीनी इंजीनियरों पर लगातार हमले कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप चीन ने भी अब पाकिस्तान की सुरक्षा क्षमता पर भरोसा खो दिया है और वह अपनी संपत्तियों की रक्षा के लिए अपनी निजी सुरक्षा एजेंसियों या सेना को पाकिस्तान में तैनात करने का दबाव बना रहा है, जो पाकिस्तान की संप्रभुता के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है।

पाकिस्तान के इतिहास में यह पहली बार देखा जा रहा है कि वह एक साथ तीन सक्रिय और बेहद संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर गंभीर सुरक्षा और कूटनीतिक संकट का सामना कर रहा है।१ ,कभी जिसे पाकिस्तान का सैन्य नेतृत्व अपनी ‘रणनीतिक गहराई’ और सुरक्षित पिछवाड़ा समझता था, आज वही अफगानिस्तान उसका सबसे बड़ा दुःस्वप्न बन चुका है। काबुल में तालिबान सरकार के आने के बाद पाकिस्तान को उम्मीद थी कि उसकी पश्चिमी सीमा सुरक्षित हो जाएगी, लेकिन इसके विपरीत डूरंड रेखा को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद हिंसक झड़पों में बदल चुका है। सीमा पार से होने वाले हमलों और पाकिस्तान द्वारा की गई हवाई कार्रवाइयों ने दोनों देशों को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है।2 दक्षिण-पश्चिम में ईरान के साथ सीमा भी अब सुरक्षित नहीं रही है। दोनों देशों के बीच हाल के वर्षों में हुए मिसाइल हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने अविश्वास की एक ऐसी गहरी खाई खोद दी है, जिसे पाटना नामुमकिन लग रहा है। ईरान का आरोप है कि पाकिस्तान अपनी धरती पर जैश-अल-अदल जैसे सुन्नी आतंकवादी संगठनों को पनाह देता है, जबकि पाकिस्तान बलूच विद्रोहियों को ईरान में शरण मिलने का दावा करता है। इस तनाव के कारण पाकिस्तान को अपनी सेना का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस सीमा पर तैनात करना पड़ा है, जिससे उसके आर्थिक संसाधन और समाप्त हो रहे हैं।३ पूर्व में भारत ने अपनी पारंपरिक रक्षात्मक नीति को पूरी तरह बदलते हुए साफ कर दिया है कि वह आतंकवाद के खिलाफ ‘सक्रिय और आक्रामक कार्रवाई’ से पीछे नहीं हटेगा। कश्मीर में धारा 370 के हटने और भारत की बढ़ती वैश्विक धक के बाद पाकिस्तान कूटनीतिक रूप से बिल्कुल अलग-थलग पड़ चुका है। इस तीन तरफा घिराव ने पाकिस्तानी सेना के संसाधनों, मनोबल और उसकी सामरिक क्षमता को पूरी तरह निचोड़ कर रख दिया है।

पाकिस्तान के अवैध नियंत्रण वाले कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान में स्थिति अब नियंत्रण से बाहर और अत्यधिक विस्फोटक हो चुकी है। दशकों से जारी आर्थिक उपेक्षा, भारी करों के बोझ, आटे-बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं की किल्लत और मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ स्थानीय जनता ने एक निर्णायक युद्ध छेड़ दिया है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी जैसे नागरिक संगठनों के नेतृत्व में लाखों लोग सड़कों पर उतर चुके हैं।

दिलचस्प और ऐतिहासिक बदलाव यह है कि अब ये प्रदर्शनकारी केवल स्थानीय स्वायत्तता या सब्सिडी की मांग नहीं कर रहे हैं। मुजफ्फराबाद से लेकर रावलकोट तक की सड़कों पर खुलकर पाकिस्तान से आजादी और भारत के साथ विलय के नारे गूंज रहे हैं। वहां की जनता सार्वजनिक रूप से पाकिस्तानी झंडे जला रही है और पाकिस्तानी सेना को एक ‘कब्जाधारी और लुटेरी फौज’ के रूप में संबोधित कर रही है। जब किसी देश की जनता अपनी ही रक्षक होने का दावा करने वाली सेना के खिलाफ इस हद तक बागी हो जाए, तो उस क्षेत्र को बंदूकों के दम पर बहुत लंबे समय तक भौगोलिक रूप से बांधकर रखना मुमकिन नहीं होता। गिलगित-बाल्टिस्तान में भी लद्दाख के साथ ऐतिहासिक व्यापारिक रास्तों को खोलने की मांग गति पकड़ रही है, जो इस्लामाबाद के लिए एक बड़ा भू-राजनीतिक झटका है।

इस विनाशकारी और निराशाजनक परिदृश्य के बीच, दुनिया के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह उठता है कि क्या पाकिस्तान का औपचारिक रूप से सोवियत संघ या यूगोस्लाविया की तरह बिखर जाना तय है? अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और भू-राजनीति के कई वरिष्ठ विश्लेषकों का मानना है कि हालात बेहद खराब होने के बावजूद, देश का तत्काल और कानूनी रूप से कई टुकड़ों में टूट जाना इतना आसान नहीं है। इसके पीछे दो मुख्य अंतरराष्ट्रीय और आंतरिक कारण काम कर रहे हैं: पहला वैश्विक समुदाय, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और यहां तक कि चीन भी कभी नहीं चाहेगा कि 24 करोड़ की आबादी वाला और परमाणु हथियारों से लैस कोई देश पूरी तरह अराजकता में बिखर जाए। यदि पाकिस्तान एक राज्य के रूप में पूरी तरह विफल होकर टूटता है, तो उसके सैकड़ों परमाणु हथियारों और मिसाइल तकनीक के विभिन्न आतंकवादी संगठनों, गैर-राज्य तत्वों या धार्मिक चरमपंथियों के हाथ में जाने का सीधा खतरा पैदा हो जाएगा। यह परिदृश्य पूरी दुनिया के अस्तित्व के लिए एक दुःस्वप्न जैसा होगा। इसलिए, अंतरराष्ट्रीय ताकतें अपनी रणनीतिक मजबूरियों के कारण पाकिस्तान को ‘डूबने’ तो दे रही हैं, लेकिन उसे पूरी तरह ‘मरने’ या बिखरने से बचाने के लिए समय-समय पर वित्तीय ऑक्सीजन देती रहती हैं।दूसरा – पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी भले ही रणनीतिक रूप से कमजोर और जनता की नजरों में बदनाम हो चुकी हों, लेकिन देश के आंतरिक संसाधनों, न्यायपालिका, मीडिया और राजनीतिक दलों पर आज भी उनका क्रूर नियंत्रण कायम है। सेना के पास अपनी सीमाओं को जबरन एकजुट रखने के लिए आधुनिक हथियार और क्रूर बल प्रयोग की असीमित क्षमता है। वे किसी भी बड़े विद्रोह को कुचलने के लिए मानव अधिकारों के हनन की सारी हदें पार करने को तैयार रहते हैं, जैसा कि वे बलूचिस्तान और सिंध में ‘इन्फोर्सड डिसअपीयरेंस’ के जरिए दशकों से करते आ रहे हैं।