कोई नौकरी जिंदगी से बड़ी नहीं, फिर भी क्यों बढ़ रहा कॉर्पोरेट दबाव

No job is more important than life itself—yet why is corporate pressure mounting?

राजेश जैन

दक्षिण अफ्रीका की 29 वर्षीय कर्मचारी सीना धलधला की मौत ने दुनिया भर में एक असहज लेकिन जरूरी सवाल खड़ा कर दिया है-क्या आधुनिक कॉर्पोरेट व्यवस्था इंसानों को धीरे-धीरे मशीनों में बदल रही है? दरअसल यह केवल एक कर्मचारी की मौत की कहानी नहीं, बल्कि उस कार्य संस्कृति का आईना है जिसमें लक्ष्य, प्रदर्शन और मुनाफा कई बार इंसान की सेहत, गरिमा और जीवन से भी ऊपर रख दिए जाते हैं।

रोजबैंक स्थित एक निजी कंपनी में कार्यरत सीना धलधला लंबे समय से अस्वस्थ बताई जा रही थीं। उनके परिवार और सहकर्मियों का आरोप है कि उन्होंने मेडिकल लीव की मांग की थी, लेकिन उसे गंभीरता से नहीं लिया गया। सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मौत से पहले उन्होंने अपनी खराब तबीयत और काम के दबाव को लेकर चिंता जताई थी। कुछ समय बाद वे कार्यालय के वॉशरूम में मृत पाई गईं। घटना की परिस्थितियों की जांच जारी है, लेकिन इस मामले ने कार्यस्थलों पर कर्मचारियों के स्वास्थ्य और मानवीय संवेदनाओं को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।

भारत में भी ऐसा ही एक मामला 2024 में सामने आया था। एक वैश्विक पेशेवर सेवा कंपनी में कार्यरत 26 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट ऐना सेबेस्टियन की मृत्यु के बाद उनके परिवार ने अत्यधिक कार्य दबाव को जिम्मेदार ठहराया। उनकी मां द्वारा लिखे गए पत्र ने देशभर में कॉर्पोरेट कार्यसंस्कृति, लंबे कार्य घंटे और कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

इन दोनों घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि समस्या किसी एक देश, कंपनी या उद्योग तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक कार्य संस्कृति का संकट बन चुकी है।

आज अधिकांश बड़ी कंपनियां एम्प्लॉयी फर्स्ट, वर्क-लाइफ बैलेंस, मेंटल हेल्थ सपोर्ट और वेलनेस कल्चर जैसे आकर्षक नारे देती हैं। आधुनिक कार्यालयों में जिम, गेम जोन, कैफेटेरिया और मनोरंजन सुविधाएं बनाई जाती हैं। लेकिन असली परीक्षा तब होती है जब कोई कर्मचारी वास्तव में बीमार पड़ता है। कई कर्मचारियों के अनुभव बताते हैं कि बीमारी की छुट्टी मांगना आज भी आसान नहीं है। कई बार उन्हें अपनी बीमारी साबित करनी पड़ती है। छुट्टी लेने पर प्रदर्शन मूल्यांकन प्रभावित होने, प्रमोशन रुकने या नौकरी खतरे में पड़ने का डर बना रहता है। परिणामस्वरूप अनेक कर्मचारी बीमारी छिपाकर काम करते रहते हैं। सीना और ऐना की घटनाएं इसी कठोर सच्चाई की ओर संकेत करती हैं।

बीमारी को कमजोरी मानने की खतरनाक सोच

भारत सहित कई देशों में बीमारी को आज भी कमजोरी की तरह देखा जाता है। कुछ प्रबंधकों की मानसिकता होती है कि कर्मचारी छुट्टी लेने के लिए बहाने बना रहे हैं। यह केवल संवेदनहीनता नहीं, बल्कि एक खतरनाक दृष्टिकोण है। वास्तविकता यह है कि कोई भी कर्मचारी बिना कारण अपनी आय, करियर और पेशेवर प्रतिष्ठा को जोखिम में डालकर छुट्टी नहीं लेना चाहता। यदि कोई कर्मचारी बार-बार स्वास्थ्य संबंधी परेशानी बता रहा है तो उसे संदेह की नजर से नहीं, सहायता की भावना से देखा जाना चाहिए।

हसल कल्चर का बढ़ता महिमामंडन

पिछले कुछ वर्षों में हसल कल्चर कॉर्पोरेट दुनिया का नया मंत्र बन गया है। इसका संदेश है-ज्यादा काम करो, कम सोओ, हमेशा उपलब्ध रहो और हर कीमत पर प्रदर्शन करो। सोशल मीडिया ने भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। देर रात तक काम करने वालों को प्रेरणादायक बताया जाता है और सप्ताहांत में काम करने वालों को असाधारण समर्पित कर्मचारी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान इसके बिल्कुल विपरीत चेतावनी देता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ ) और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ ) की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार लंबे समय तक काम करने के कारण 2016 में दुनिया भर में लगभग 7.45 लाख लोगों की मृत्यु स्ट्रोक और हृदय रोगों से हुई थी। अध्ययन के अनुसार प्रति सप्ताह 55 घंटे या उससे अधिक काम करने वाले कर्मचारियों में गंभीर स्वास्थ्य जोखिम काफी बढ़ जाते हैं।

बर्नआउट: दिखाई नहीं देने वाली बीमारी

उत्पादकता बढ़ाने और लागत कम करने की होड़ में कई कंपनियां कर्मचारियों पर अतिरिक्त कार्यभार डालती हैं। हाई परफॉर्मेंस कल्चर, ऑर्गेनाइजेशनल स्ट्रेच और वैरिएबल पे जैसे आकर्षक शब्द कई बार दबाव को वैध ठहराने का माध्यम बन जाते हैं। इसका परिणाम बर्नआउट के रूप में सामने आता है। बर्नआउट केवल थकान नहीं है। यह मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक टूटन की स्थिति है। इससे प्रभावित व्यक्ति धीरे-धीरे अवसाद, चिंता, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी समस्याओं की चपेट में आ सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य: अगला बड़ा संकट

आज कॉर्पोरेट कर्मचारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक मानसिक स्वास्थ्य है। चिंता, अवसाद, अकेलापन और बर्नआउट तेजी से बढ़ रहे हैं। समस्या यह है कि मानसिक थकान दिखाई नहीं देती। जब कोई कर्मचारी बुखार की बात करता है तो उसे दवा मिल जाती है, लेकिन जब वह मानसिक रूप से टूटने की बात करता है तो कई बार उसे कमजोर या कम प्रतिबद्ध माना जाता है। यही सोच सबसे अधिक नुकसान पहुंचाती है।

भारत: दुनिया के सबसे अधिक काम करने वाले देशों में

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के अनुसार भारत दुनिया के सबसे अधिक काम करने वाले देशों में शामिल है। भारतीय कर्मचारी औसतन प्रति सप्ताह 46.7 घंटे काम करते हैं और लगभग आधा कार्यबल 49 घंटे या उससे अधिक काम करता है। ये आंकड़े केवल काम के घंटे नहीं बताते, बल्कि उस मानसिक दबाव की तस्वीर भी पेश करते हैं जो लाखों कर्मचारियों के दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है।

क्या अधिक घंटे काम करने से देश समृद्ध हो जाता है?

इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से “नहीं” है। नॉर्वे, नीदरलैंड, डेनमार्क और जर्मनी जैसे देशों में कार्य घंटे अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति आय और उत्पादकता दुनिया में सबसे अधिक है। इन देशों ने यह सिद्ध किया है कि आर्थिक विकास का संबंध केवल लंबे कार्य घंटों से नहीं, बल्कि कुशल कार्यप्रणाली, तकनीक, नवाचार और कर्मचारियों के बेहतर स्वास्थ्य से भी होता है।

इसलिए विफल हो जाते हैं श्रम कानून

भारत में श्रमिकों की सुरक्षा के लिए अनेक कानून मौजूद हैं। कार्य समय, ओवरटाइम, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल सुरक्षा से जुड़े स्पष्ट प्रावधान भी हैं। फिर भी व्यवहारिक स्तर पर समस्याएं बनी रहती हैं। इसके प्रमुख कारण हैं—टारगेट और डेडलाइन का बढ़ता दबाव, निरीक्षण और जवाबदेही की कमी, निजी क्षेत्र में कर्मचारी संगठनों का कमजोर होना, नौकरी खोने का भय तथा कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता। अधिकांश कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं होते।

दुनिया से क्या सीख सकता है भारत?

यूरोप के कई देशों ने राइट टू डिस्कनेक्ट कानून लागू किए हैं। फ्रांस सहित कई देशों में कर्मचारी कार्यालय समय के बाद ईमेल या कॉल का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं हैं। इन देशों ने यह स्वीकार किया है कि आराम भी उत्पादकता का हिस्सा है, विलासिता नहीं। भारत में भी कार्यस्थल सुधारों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों के अनुसार निम्न कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं –

  • राइट टू डिस्कनेक्ट को कानूनी मान्यता
  • मेडिकल लीव को वास्तविक कर्मचारी अधिकार बनाना
  • स्वतंत्र स्वास्थ्य और कार्यस्थल ऑडिट
  • कार्यभार का वैज्ञानिक मूल्यांकन
  • मानसिक स्वास्थ्य सहायता की अनिवार्य व्यवस्था
  • प्रबंधकों को संवेदनशील नेतृत्व का प्रशिक्षण
  • स्वास्थ्य आपातकाल में त्वरित चिकित्सा सहायता की बाध्यता
  • गंभीर लापरवाही पर प्रबंधन की जवाबदेही तय करना

आखिरकार सवाल केवल नौकरी का नहीं, जीवन का

कंपनियों को यह समझना होगा कि कर्मचारी कोई संसाधन मात्र नहीं हैं। वे इंसान हैं, जिनकी अपनी सीमाएं, भावनाएं और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें हैं। किसी भी संगठन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी इमारतें, मशीनें या बैलेंस शीट नहीं, बल्कि उसके कर्मचारी होते हैं। यदि स्वास्थ्य, सम्मान और मानवीय गरिमा को प्रदर्शन और लाभ से नीचे रखा जाएगा तो ऐसी त्रासदियां बार-बार सामने आती रहेंगी। कोई भी लक्ष्य, कोई भी डेडलाइन और कोई भी मुनाफा इतना महत्वपूर्ण नहीं हो सकता कि उसके लिए किसी की जान चली जाए। अर्थव्यवस्था इंसानों के लिए बनी है, इंसान अर्थव्यवस्था के लिए नहीं।