मेहनतकश किसान की खेत की मिट्टी से निकला अनुभव कई बार बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाओं से भी अधिक सच्चा और उपयोगी सिद्ध होता है : राजाराम त्रिपाठी

The experience gained from the soil of a hardworking farmer's field often proves to be more true and useful than that of big laboratories: Rajaram Tripathi

दीपक कुमार त्यागी

कोंडागांव : देश में असमय वर्षा और लगातार बढ़ती गर्मी के बीच छत्तीसगढ़ के बस्तर की धरती से कृषि क्षेत्र के लिए एक अत्यंत उत्साहजनक और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। राजस्थान से आए 700 से अधिक प्रगतिशील जैविक किसानों के उच्चाधिकार प्राप्त प्रतिनिधिमंडल ने कोंडागांव स्थित “मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सेंटर” का विस्तृत अध्ययन करने के बाद “मां दंतेश्वरी हर्बल समूह” की सदस्यता स्वीकार कर ली है। इसे देश में जैविक, हर्बल एवं मसाला खेती के क्षेत्र में किसान-आधारित राष्ट्रीय नेटवर्क के विस्तार की दिशा में एक बेहद अहम महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

राजस्थान के अलावा उड़ीसा तथा महाराष्ट्र से पहुंचे प्रगतिशील किसानों ने भी इस दौरान बस्तर में विकसित जैविक एवं प्राकृतिक खेती के विविध मॉडलों का गंभीर अध्ययन किया। प्रतिनिधिमंडल ने पूरे दिन फार्म पर विकसित काली मिर्च, स्टीविया, सफेद मूसली, हर्बल एवं मसाला फसलों, प्राकृतिक नवाचारों तथा किसानों के साथ मिलकर विकसित किए गए खेती मॉडल को निकट से देखा और समझा।

यहां आपको बता दें कि “मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सेंटर” में विशेष रूप से विकसित की गई उच्च उत्पादकता वाली काली मिर्च की विशेष किस्म ने देश व दुनिया के किसानों का ध्यान आकर्षित किया है। फार्म में विकसित “मां दंतेश्वरी ब्लैक पेपर-16” ऐसी उन्नत किस्म बताई गई, जो सामान्य भारतीय किस्मों की तुलना में कई गुना अधिक उत्पादन देने की क्षमता रखती है तथा कम सिंचाई में भी गर्म क्षेत्रों में सफलतापूर्वक विकसित की जा सकती है। किसानों ने इसे भविष्य की मसाला खेती के लिए अत्यंत संभावनाशील मॉडल बताया।

इसके साथ ही “नेचुरल ग्रीनहाउस” मॉडल भी प्रतिनिधिमंडल के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहा। पेड़ों और प्राकृतिक संरचनाओं के सहारे विकसित इस अभिनव मॉडल को प्लास्टिक आधारित महंगे पॉलीहाउस का पर्यावरण-अनुकूल और कम लागत वाला विकल्प माना जा रहा है। किसानों को बताया गया कि जहां सामान्य पॉलीहाउस पर प्रति एकड़ लगभग 40 लाख रुपये तक की लागत आती है, वहीं यह प्राकृतिक ग्रीनहाउस मॉडल अत्यंत कम लागत में अधिक टिकाऊ और प्रकृति-सम्मत समाधान प्रस्तुत करता है।

भ्रमण के पश्चात आयोजित विशेष बैठक में प्रतिनिधिमंडल ने सामूहिक चर्चा के बाद भविष्य में “मां दंतेश्वरी हर्बल समूह” के साथ मिलकर कार्य करने का निर्णय लिया। इसके अंतर्गत राजस्थान के ये सैकड़ों किसान अब जैविक, हर्बल एवं मसाला खेती के क्षेत्र में उत्पादन, तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण और मार्केटिंग तक साझा रणनीति के तहत कार्य करेंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि वीरता, संघर्षशीलता और अद्भुत जीवटता के लिए प्रसिद्ध राजस्थान के किसानों का बस्तर के जैविक एवं हर्बल खेती मॉडल से जुड़ना कृषि क्षेत्र में नए प्रयोगों और अनुभवों के आदान-प्रदान को नई दिशा देगा। इससे देश में टिकाऊ खेती, प्राकृतिक कृषि और किसानों की आय वृद्धि को भी मजबूती मिलने की संभावना है।

इस अवसर पर प्रसिद्ध कृषि नवप्रवर्तक तथा पर्यावरणविद् डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि किसानों को नई तकनीकों, विज्ञान और वैज्ञानिक सोच से जुड़ना चाहिए, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक यह है कि सफल किसानों के अनुभवों से सीखने की विनम्रता समाज और कृषि व्यवस्था में बनी रहे।

डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी ने कहा, “वर्षों तक धरती पर पसीना बहाकर खेती करने वाले मेहनतकश किसानों का अनुभव किसी भी प्रयोगशाला से कम महत्वपूर्ण नहीं होता। खेत की मिट्टी से निकला अनुभव कई बार बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाओं से भी अधिक सच्चा और उपयोगी सिद्ध होता है।”

यहां आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ के बस्तर स्थित “मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सेंटर” डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी के नेतृत्व में पिछले कई वर्षों से जैविक खेती, हर्बल फसलों, प्राकृतिक कृषि नवाचारों तथा आदिवासी किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहा है। देश के विभिन्न राज्यों से किसान, कृषि विशेषज्ञ और शोधकर्ता यहां लगातार अध्ययन एवं प्रशिक्षण हेतु पहुंच रहे हैं। कृषि क्षेत्र में नवाचारों के दम पर उन्नत खेती करके देश व दुनिया के किसानों के बीच “मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सेंटर” की एक विशिष्ट पहचान बनती जा रही है।