हरित ऊर्जा क्रांति का ऐतिहासिक शंखनाद, जींद से दौड़ी भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन

A historic clarion call for the green energy revolution: India's first hydrogen train runs from Jind

स्टीम से डीजल,डीजल से विद्युत और अब हाइड्रोजन -भारतीय रेल ने रचा विकास का स्वर्णिम इतिहास

विनोद कुमार सिंह ‘तकियावाला’

भारतीय रेल केवल लोहे की पटरियों पर दौड़ने वाली रेलगाड़ियों का विशाल नेटवर्क नहीं है,बल्कि यह भारत की आर्थिक शक्ति,सामाजिक समरसता,राष्ट्रीय एकता और तकनीकी प्रगति का सबसे सशक्त प्रतीक भी है।लगभग डेढ़ सौ वर्षों से अधिक की अपनी गौरवशाली यात्रा में भारतीय रेल ने अनेक ऐतिहासिक पड़ाव पार किए हैं।स्टीम इंजन से प्रारम्भ हुई यह यात्रा डीजल और फिर विद्युत इंजनों तक पहुँची,और अब भारत हरित ऊर्जा के उस नए स्वर्णिम युग में प्रवेश कर चुका है,जहाँ रेलगाड़ियाँ जीवाश्म ईंधन नहीं,बल्कि स्वच्छ हाइड्रोजन ऊर्जा के सहारे आगे बढ़ेंगी।हरियाणा के ऐतिहासिक नगर जींद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाया जाना केवल एक नई रेल सेवा का शुभारम्भ नहीं,बल्कि विकसित भारत,आत्मनिर्भर भारत और हरित भारत के साझा संकल्प का उद्घोष है।यह क्षण भारतीय रेल के इतिहास में उसी प्रकार स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा,जैसे कभी पहली रेलगाड़ी के संचालन, राजधानी एक्सप्रेस,शताब्दी, मेट्रो अथवा वंदे भारत ट्रेनों के शुभारम्भ को याद किया जाता है।

जींद का चयन भी अत्यंत प्रतीकात्मक है।हरियाणा का यह नगर केवल एक रेलवे जंक्शन नहीं,बल्कि इतिहास,आस्था और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत केंद्र है।महाभारतकालीन परम्पराओं से जुड़े इस क्षेत्र का उल्लेख अनेक ऐतिहासिक संदर्भों में मिलता है।जनश्रुतियों के अनुसार इसका संबंध देवी जयन्ती की आराधना से भी माना जाता है।आज यही भूमि भारत की आधुनिक वैज्ञानिक चेतना और हरित प्रौद्योगिकी के नए अध्याय की साक्षी बन रही है। अतीत की सांस्कृतिक विरासत और भविष्य की वैज्ञानिक सोच का यह अद्भुत संगम जींद को राष्ट्रीय मानचित्र पर नई पहचान प्रदान करता है।रेलवे की दृष्टि से भी जींद का महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।उत्तर रेलवे का यह प्रमुख जंक्शन वर्षों से हरियाणा,दिल्ली,पंजाब और राजस्थान को जोड़ने वाला रणनीतिक रेल केंद्र है।बदलते समय के साथ इसका आधुनिकीकरण हुआ और अब यही जंक्शन भारत की हरित रेल क्रांति का प्रारम्भिक केंद्र बन गया है।भारतीय रेल ने पिछले एक दशक में परिवर्तन की ऐसी गति देखी है, जिसकी कल्पना कुछ वर्ष पहले तक कठिन थी। वंदे भारत ट्रेनों का विस्तार, अमृत भारत एक्सप्रेस का संचालन, समर्पित माल गलियारे (Dedicated Freight Corridors),कवच जैसी स्वदेशी सुरक्षा प्रणाली,अमृत भारत स्टेशन योजना के अंतर्गत रेलवे स्टेशनों का पुनर्विकास,लगभग सम्पूर्ण ब्रॉडगेज नेटवर्क का विद्युतीकरण, आधुनिक सिग्नलिंग व्यवस्था तथा डिजिटल यात्री सेवाओं ने रेलवे की कार्यसंस्कृति और छवि दोनों को बदल दिया है।अब हाइड्रोजन ट्रेन इस परिवर्तन यात्रा का अगला और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव बनकर सामने आई है।

हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक भविष्य के स्वच्छ परिवहन की आधारशिला मानी जा रही है।इस तकनीक में डीजल का उपयोग नहीं होता। ईंधन सेल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती है,जिससे ट्रेन संचालित होती है। इस पूरी प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड या अन्य प्रदूषक गैसों का उत्सर्जन नहीं होता; केवल जलवाष्प निकलती है।यही कारण है कि इसे ‘जीरो एमिशन ट्रांसपोर्ट’ की दिशा में सबसे प्रभावी तकनीकों में शामिल किया जाता है।यूरोप,जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देश पहले से इस दिशा में कार्य कर रहे हैं।ऐसे समय में भारत का स्वदेशी तकनीक और अपनी इंजीनियरिंग क्षमता के बल पर इस क्षेत्र में प्रवेश करना केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं,बल्कि वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन में भारत की सक्रिय भागीदारी का संकेत भी है।भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का निर्माण भारतीय इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और रेलवे तकनीकी विशेषज्ञों की क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है।चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्टरी में विकसित इस ट्रेन में अत्याधुनिक हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रणाली स्थापित की गई है। जींद में स्थापित हाइड्रोजन उत्पादन एवं रिफ्यूलिंग अवसंरचना इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल नई तकनीकों का उपभोक्ता नहीं,बल्कि उनका विकास, निर्माण और संचालन करने वाला अग्रणी राष्ट्र बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।

जींद में स्थापित हरित हाइड्रोजन संयंत्र इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण आधार है।यहाँ स्थापित एक मेगावाट क्षमता का इलेक्ट्रोलाइज़र प्रतिदिन लगभग 420 किलोग्राम हरित हाइड्रोजन का उत्पादन करने में सक्षम है। लगभग 3000 किलोग्राम हाइड्रोजन भंडारण की व्यवस्था तथा आधुनिक रिफ्यूलिंग प्रणाली इस परियोजना को पूर्णतः आत्मनिर्भर बनाती है।यही मॉडल भविष्य में देश के अन्य रेल मार्गों पर भी विकसित किया जा सकता है।यह परियोजना केवल रेलवे तक सीमित नहीं है।इसके माध्यम से भारत हरित हाइड्रोजन मिशन को व्यवहारिक रूप देने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते कार्बन उत्सर्जन और ऊर्जा सुरक्षा जैसी चुनौतियों से जूझ रही है,तब स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन व्यवस्था भारत को वैश्विक नेतृत्व की नई भूमिका प्रदान कर सकती है।हाइड्रोजन ट्रेनों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इन्हें उन रेलमार्गों पर भी संचालित किया जा सकता है जहाँ विद्युत लाइन बिछाना आर्थिक या तकनीकी दृष्टि से कठिन है।इससे दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में भी पर्यावरण अनुकूल रेल सेवाएँ उपलब्ध कराई जा सकेंगी।साथ ही डीजल पर निर्भरता कम होने से विदेशी मुद्रा की बचत होगी और ऊर्जा आयात पर निर्भरता भी घटेगी।यह उपलब्धि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान की सफलता का भी सशक्त उदाहरण है।जिस तकनीक को कभी केवल विकसित देशों की उपलब्धि माना जाता था,आज वही तकनीक भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के हाथों विकसित होकर भारतीय रेल की पटरियों पर दौड़ रही है।इससे यह संदेश भी जाता है कि भारत अब केवल तकनीक खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि नई तकनीकों का निर्माण और निर्यात करने की क्षमता भी विकसित कर रहा है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले वर्षों में रेलवे के आधुनिकीकरण को राष्ट्रीय विकास का महत्वपूर्ण आधार बनाया है। रेलवे के लिए रिकॉर्ड पूंजीगत निवेश,नई उत्पादन इकाइयों का विस्तार, स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा, हरित ऊर्जा का उपयोग तथा यात्री सुविधाओं में व्यापक सुधार उसी दूरदर्शी सोच का परिणाम हैं।हाइड्रोजन ट्रेन इसी परिवर्तनकारी दृष्टि का नवीनतम अध्याय है।इस परियोजना का प्रभाव केवल पर्यावरण या परिवहन तक सीमित नहीं रहेगा।हाइड्रोजन उत्पादन,भंडारण, परिवहन,रखरखाव और अनुसंधान से जुड़े नए उद्योग विकसित होंगे। हजारों कुशल तकनीकी रोजगार सृजित होंगे।विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों में हाइड्रोजन ऊर्जा पर अनुसंधान को नई गति मिलेगी।भारतीय उद्योगों के लिए भी अत्याधुनिक ऊर्जा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नए अवसर खुलेंगे।

हरित ऊर्जा की दिशा में भारत पहले ही सौर, पवन,जैव ईंधन और हरित हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। रेलवे का इस परिवर्तन का नेतृत्व करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय रेल विश्व के सबसे बड़े सार्वजनिक परिवहन नेटवर्कों में से एक है।यदि इतना विशाल नेटवर्क स्वच्छ ऊर्जा की ओर अग्रसर होता है तो उसका सकारात्मक प्रभाव केवल भारत ही नहीं,बल्कि वैश्विक जलवायु प्रयासों पर भी पड़ेगा।जींद से प्रारम्भ हुई यह यात्रा केवल एक रेलगाड़ी की यात्रा नहीं है।यह उस नए भारत की यात्रा है,जो परम्परा और आधुनिकता,विज्ञान और संस्कृति,विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करते हुए भविष्य की ओर आत्मविश्वास से बढ़ रहा है।स्टीम से डीजल, डीजल से विद्युत और अब हाइड्रोजन तक पहुँची भारतीय रेल की यह विकासगाथा बताती है कि परिवर्तन ही प्रगति का सबसे बड़ा आधार है।निस्संदेह, जींद से दौड़ी भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन आने वाले वर्षों में केवल एक तकनीकी उपलब्धि के रूप में नहीं,बल्कि उस ऐतिहासिक क्षण के रूप में याद की जाएगी जब भारतीय रेल ने हरित ऊर्जा क्रांति का शंखनाद किया और विकसित भारत की दिशा में एक नया स्वर्णिम अध्याय लिख दिया।यह केवल रेलवे की सफलता नहीं,बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक आकांक्षाओं,वैज्ञानिक क्षमता और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प का साकार रूप है। आने वाले समय में जब देश के विभिन्न रेलखंडों पर हाइड्रोजन ट्रेनें नियमित रूप से दौड़ेंगी, तब इतिहास यह अवश्य दर्ज करेगा कि हरित भारत की इस नई यात्रा का प्रथम उद्घोष हरियाणा की पावन धरती जींद से हुआ था।