जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा : आस्था, समर्पण, समानता और मानवता का दिव्य महापर्व

The Rath Yatra of Jagannath Puri: A Divine Grand Festival of Faith, Devotion, Equality, and Humanity

मंजू लोढ़ा

भारत की सनातन संस्कृति में अनेक पर्व और उत्सव मनाए जाते हैं, लेकिन ओडिशा के पुरी में आयोजित भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा विश्व के सबसे विशाल और दिव्य धार्मिक आयोजनों में से एक है। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, समर्पण, सेवा, समानता और मानवता का अनुपम महापर्व है, जो करोड़ों श्रद्धालुओं को एक सूत्र में बाँध देता है।

पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर चार धामों में से एक माना जाता है। यहाँ भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं।

रथयात्रा कब होती है?

रथयात्रा प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन प्रारंभ होती है। इसी दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों में विराजमान होकर श्रीमंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। वहाँ लगभग सात दिन विराजमान रहने के पश्चात आषाढ़ शुक्ल दशमी को बहुदा यात्रा के माध्यम से पुनः अपने मूल मंदिर लौटते हैं। सम्पूर्ण उत्सव लगभग नौ दिनों तक चलता है।

तीनों रथों के नाम :-

  • भगवान जगन्नाथ – नंदीघोष
  • भगवान बलभद्र – तालध्वज
  • माता सुभद्रा – दर्पदलन (देवदलन)

“जगन्नाथ” अर्थात् जगत के नाथ — सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी। वे किसी एक जाति, धर्म, समाज या देश के नहीं, बल्कि समस्त चराचर जगत के भगवान हैं। शायद यही कारण है कि वर्ष में एक बार वे स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों के बीच आते हैं, ताकि कोई भी उनके दर्शन से वंचित न रह जाए।

कौन कहता है कि भगवान केवल मंदिरों में निवास करते हैं? वे तो हर उस हृदय में बसते हैं जहाँ श्रद्धा, प्रेम और निष्कपट भक्ति होती है। मनुष्य, पशु-पक्षी, वृक्ष, वनस्पति और प्रकृति का प्रत्येक कण उनकी सृष्टि है, इसलिए उनकी कृपा भी सभी पर समान रूप से बरसती है।

रथयात्रा का सबसे सुंदर दृश्य तब होता है जब लाखों श्रद्धालु एक साथ भगवान के रथ की रस्सी पकड़कर उसे खींचते हैं। उस क्षण न कोई ऊँच-नीच रहती है, न अमीर-गरीब का भेद—सब केवल भगवान के भक्त बन जाते हैं। यही इस महापर्व की सबसे बड़ी विशेषता है।

रथयात्रा का एक अत्यंत प्रेरणादायक प्रसंग “छेरा पहरा” है। इसमें गजपति महाराज स्वयं स्वर्णमंडित झाड़ू से भगवान के रथ के मार्ग की सफाई करते हैं। एक राजा का सेवक बन जाना यह संदेश देता है कि ईश्वर के समक्ष सभी समान हैं। वास्तव में सबसे बड़ा वही है, जो सबसे अधिक विनम्र है।

रथयात्रा के तीनों रथ हर वर्ष नई लकड़ी से बनाए जाते हैं। पुराने रथों का पुनः उपयोग नहीं किया जाता। यह हमें सिखाता हैं कि जीवन भी निरंतर नवीनता, परिवर्तन और आगे बढ़ने का नाम है। यह परम्परा केवल रथ निर्माण की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का भी प्रतीक हैं कि समय के साथ स्वयं को नवीनीकृत करते हुए आगे बढ़ना ही प्रगति का मार्ग है।

पुरी का महाप्रसाद भी भारतीय संस्कृति की समरसता का अद्भुत प्रतीक है। भगवान को अर्पित होने के बाद यह प्रसाद बिना किसी भेदभाव के सभी भक्त एक साथ ग्रहण करते हैं। यह संदेश देता हैं कि ईश्वर की कृपा और प्रसाद पर सबका समान अधिकार है।

भक्ति में न धन का महत्व है, न वैभव का। भगवान तो केवल प्रेम देखते हैं। कर्माबाई के खिचड़े की कथा इसका अमर उदाहरण है। अत्यंत सरल भाव से प्रतिदिन भगवान के लिए बनाई गई खिचड़ी को उनके निष्कपट प्रेम ने इतना पवित्र बना दिया कि भगवान स्वयं उसका भोग स्वीकार करने आते थे। यह कथा बताती हैं कि भगवान को छप्पन भोग से अधिक प्रिय भक्त का निष्कलुष प्रेम है।

रथयात्रा का आध्यात्मिक संदेश अत्यंत गहन है। यह केवल भगवान का एक मंदिर से दूसरे मंदिर जाना नहीं, बल्कि उस परमात्मा का अपनी संतान के बीच स्वयं चलकर आना है। मानो वे प्रत्येक भक्त से कह रहे हों—”यदि किसी कारणवश तुम मेरे पास नहीं आ सकते, तो मैं स्वयं तुम्हारे पास आ जाता हूँ।”

यही कारण है कि जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा केवल एक धार्मिक परम्परा नहीं, बल्कि प्रेम, सेवा, समानता, विनम्रता और मानवता का जीवंत महापर्व है। जब लाखों हाथ मिलकर रथ की रस्सी थामते हैं, तब केवल भगवान का रथ ही आगे नहीं बढ़ता, बल्कि समाज की एकता, सामूहिक चेतना और मानवता भी आगे बढ़ती है।