विनोद कुमार सिंह ‘तकियावाला’
भारतीय सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है।वह समाज का दर्पण,समय का दस्तावेज़ और राष्ट्र की सामूहिक चेतना का रचनात्मक विस्तार भी है।यही कारण है कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा हर वर्ष केवल फिल्मों और कलाकारों के सम्मान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह उस सांस्कृतिक दिशा का भी संकेत देती है जिसकी ओर भारतीय सिनेमा अग्रसर है। वर्ष 2024 के लिए घोषित 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार इसी परिवर्तनशील यात्रा के सशक्त प्रमाण हैं।इस वर्ष के पुरस्कारों पर दृष्टि डालने से स्पष्ट होता है कि भारतीय सिनेमा अब विषयों के चयन में अधिक परिपक्व, प्रस्तुति में अधिक साहसी और तकनीकी दृष्टि से अधिक सक्षम हुआ है। पुरस्कारों ने यह संदेश दिया है कि दर्शकों की बदलती रुचि, सामाजिक यथार्थ,इतिहास की पुनर्व्याख्या,राष्ट्रीय चेतना, विज्ञान,लोकजीवन और आधुनिक तकनीक-इन सभी का संतुलित समावेश ही आज उत्कृष्ट सिनेमा की पहचान बन रहा है।
सबसे अधिक चर्चा ‘आर्टिकल 370’ को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान मिलने की रही। किसी भी फिल्म का मूल्यांकन केवल उसके विषय से नहीं,बल्कि उसके सिनेमाई निष्पादन, कथानक की विश्वसनीयता, पटकथा की कसावट,निर्देशन की परिपक्वता और अभिनय की प्रभावशीलता से होता है। इस दृष्टि से यह फिल्म समकालीन भारत के एक संवेदनशील विषय को गंभीरता और प्रभाव के साथ प्रस्तुत करती है।राष्ट्रीय पुरस्कार ने यह स्पष्ट कर दिया कि ज्वलंत राष्ट्रीय विषयों पर बनी सार्थक फिल्मों को भी अब समान सम्मान मिल रहा है।इस फिल्म की एक और बड़ी उपलब्धि यामी गौतम का सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार है।
उन्होंने अपने पात्र को केवल निभाया नहीं, बल्कि उसे जीवंत बनाया। लंबे समय तक हिंदी फिल्मों में महिला पात्रों को प्रायः सहायक भूमिका तक सीमित रखा गया, किंतु आज की अभिनेत्री कथा का केंद्र बन रही है।यामी गौतम का सम्मान इसी सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक है।सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में कार्तिक आर्यन और ममूटी का संयुक्त चयन भारतीय सिनेमा की विविधता को रेखांकित करता है। ‘चंदू चैंपियन’ में कार्तिक आर्यन ने एक खिलाड़ी के संघर्ष, आत्मविश्वास और अदम्य इच्छाशक्ति को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।दूसरी ओर ‘ब्रमायुगम’ में ममूटी ने अपने अनुभवी अभिनय से यह सिद्ध कर दिया कि अभिनय केवल संवाद बोलने की कला नहीं, बल्कि चरित्र की आत्मा को जीने की क्षमता है।एक युवा अभिनेता और एक दिग्गज कलाकार का समान मंच पर सम्मानित होना भारतीय सिनेमा की स्वस्थ परंपरा का परिचायक है।इस वर्ष की सबसे सुखद उपलब्धियों में अभिनेता रणदीप हुड्डा का निर्देशक के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होना भी शामिल है। ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ जैसी ऐतिहासिक और वैचारिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण फिल्म के माध्यम से उन्होंने यह दिखाया कि जब अभिनेता शोध, संवेदनशीलता और दृष्टि के साथ निर्देशन करता है तो परिणाम उल्लेखनीय हो सकता है।पहली ही निर्देशित फिल्म के लिए राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करना उनके रचनात्मक साहस की स्वाभाविक स्वीकृति है।राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की एक विशिष्ट विशेषता यह रही है कि वे हमेशा समानांतर सिनेमा, वृत्तचित्रों और लघु फिल्मों को भी बराबर महत्व देते हैं।इस बार ‘भंगार’ को सर्वश्रेष्ठ गैर-फीचर फिल्म तथा ‘राम-नामी’ को सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र का सम्मान मिलना इस परंपरा को और मजबूत करता है। ये फिल्में उन लोगों,समुदायों और जीवन- संघर्षों की कहानियाँ सामने लाती हैं, जिन तक मुख्यधारा का सिनेमा अक्सर नहीं पहुँच पाता।वास्तव में किसी भी देश की सांस्कृतिक समृद्धि का मूल्यांकन उसके वृत्तचित्रों और गैर-फीचर फिल्मों से भी होता है।इन पुरस्कारों का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि व्यावसायिक सफलता और कलात्मक उत्कृष्टता के बीच की दूरी अब लगातार कम हो रही है। ‘कल्कि 2898 एडी’, ‘पुष्पा : द रूल पार्ट-02’, ‘स्त्री 2’ और ‘अमरन’ जैसी लोकप्रिय फिल्मों की विभिन्न श्रेणियों में उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीय पुरस्कार अब केवल तथाकथित कला फिल्मों तक सीमित नहीं हैं। यदि कोई फिल्म तकनीकी दृष्टि से उत्कृष्ट है,प्रभावशाली कहानी कहती है और दर्शकों से गहरा जुड़ाव स्थापित करती है,तो उसे सम्मान मिलना स्वाभाविक है।
भारतीय सिनेमा का यह संक्रमणकाल अत्यंत महत्वपूर्ण है। डिजिटल तकनीक,कृत्रिम बुद्धिमत्ता,उन्नत दृश्य प्रभाव, उत्कृष्ट ध्वनि संयोजन और वैश्विक स्तर की छायांकन तकनीकों ने फिल्म निर्माण की गुणवत्ता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है।आज भारतीय फिल्में केवल घरेलू बाजार के लिए नहीं बन रहीं,बल्कि विश्व के दर्शकों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही हैं। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में तकनीकी उत्कृष्टता को मिला सम्मान इसी बदलती सोच का परिचायक है।एक फिल्म समीक्षक के रूप में यह भी कहना आवश्यक है कि राष्ट्रीय पुरस्कारों का उद्देश्य केवल लोकप्रियता का उत्सव मनाना नहीं होता।उनका मूल उद्देश्य उन फिल्मों को सामने लाना है जो समाज को सोचने पर विवश करें, नई बहसें प्रारंभ करें और कला की गरिमा को बनाए रखें।
इस दृष्टि से इस वर्ष के अधिकांश निर्णय संतुलित और दूरदर्शी प्रतीत होते हैं। इनमें कला और बाज़ार,विचार और मनोरंजन, परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन दिखाई देता है। हालाँकि,यह भी सच है कि हर राष्ट्रीय पुरस्कार की तरह इस बार भी कुछ निर्णयों पर बहस होगी। कुछ उत्कृष्ट फिल्मों और कलाकारों के समर्थक स्वयं को उपेक्षित महसूस कर सकते हैं। यह स्वाभाविक है,क्योंकि सिनेमा एक रचनात्मक विधा है और कला का मूल्यांकन पूर्णतः वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकता।किंतु राष्ट्रीय पुरस्कारों की विश्वसनीयता इसी बात में है कि वे व्यापक दृष्टि से भारतीय सिनेमा की समग्र उपलब्धियों का सम्मान करने का प्रयास करते हैं।आज भारतीय सिनेमा क्षेत्रीय सीमाओं को तोड़ चुका है।मलयालम,तमिल,तेलुगु, कन्नड़,मराठी,असमिया,बांग्ला और हिंदी सहित सभी भाषाओं की फिल्में राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन रही हैं।ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने भाषा की दीवारें लगभग समाप्त कर दी हैं।परिणामस्वरूप अब दर्शक अच्छी कहानी को भाषा से नहीं,गुणवत्ता से पहचानते हैं। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में यह विविधता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।अंततः, 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार यह संदेश देते हैं कि भारतीय सिनेमा का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है।यह वह दौर है जहाँ मनोरंजन के साथ विचार भी है,तकनीक के साथ संवेदना भी है,इतिहास के साथ भविष्य की कल्पना भी है और स्थानीय कथाओं के साथ वैश्विक दृष्टि भी। यही भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी शक्ति है।इन पुरस्कारों ने एक बार फिर सिद्ध किया है कि श्रेष्ठ सिनेमा वही है जो समय के प्रश्नों से संवाद करे,समाज की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दे और दर्शकों के मन पर स्थायी छाप छोड़े।72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार केवल फिल्मों का सम्मान नहीं,बल्कि भारतीय सिनेमा की उस परिपक्व यात्रा का अभिनंदन हैं जो निरंतर नई ऊँचाइयों की ओर अग्रसर है।





